Wednesday, June 3, 2009

तड़प, भाग-53

दिल से निकली आवाज दिल की गहराइयों में उतर रही है, इश्वर सब सुन रहा है, हम दोनों के मन की मुराद जरूर पूरी होगी... मैं तुम्हें पूरी आजादी दूंगा , पूरा सम्मान दूंगा...
शैली- मैं समझ सकती हूँ... तुम्हारे जज्बात पाक साफ़ हैं, तुम्हारे विचारों में पवित्रता झलक रही है....
दीपू- तुम बहुत भावुक हो... ऊपर से कठोर दिखती हो मगर अन्दर से नारियल की तरह हो... बिल्कुल शुद्ध , निर्मल और मुलायम... बेहद मधुर और शीतल-शीतल......
शैली- मेरी इतनी तारीफ़ भी न करो किमैं घमंडी हो जाऊं.... मुझे अंहकार पसंद नहीं है....
दीपू- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मैं जान गया हूँ तुम्हें... तुमने अपने सम्मान की खातिर राजेश की ह्त्या करदी यह बहुत बड़ी बात है... मैंने सुना है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा जुल्म सहने वाला गुनाहगार होता है, तुमने जुल्म का प्रतिकार करके यह सिद्ध कर दिया कि तुम आत्मसम्मान कि रक्षा करने के लिए कुछ भी कर सकती हो...बहादुर लोग ही ऐसा कर सकते हैं...
शैली- क्षण भर का आवेग था जो हो गया सो गया... वैसे बहुत पछता रही हूँ मैं...
दीपू- तुम्हारी जगह कोई दूसरी औरत होती तो जीवन भर उस राजेश और रवि की गुलाम बनी रहती... तुम्हें अपने निर्णय पर गर्व होना चाहिए... खुश होना चाहिए तुम्हें....
शैली- सच कहूं तो मेरा दिल बहुत जोर-जोर से धड़कता है, पश्चाताप कि चिंगारियों में मेरा वजूद झुलस रहा है... मैंने उस आवेग में आकर राजेश को मौत के घाट तो उतार दिया लेकिन अब बहुत दुःख होता है... कभी जब राजेश वाली बात याद आती है तो बहुत ग्लानी होती है... मन उचाट जाता है...
दीपू- क्यों ? मन पर इतना बोझ क्यों ? जब उसे मारा तब नहीं सोचा था क्या ?
शैली- नहीं, सब अचानक हो गया ....तुम जानना चाहते हो कैसे हुआ ये सब .... मैंने योजना को अंजाम तो धीरे -धीरे दिया मगर योजना अचानक बन गयी...
दीपू- अब मैं हर बात सुनूंगा मगर प्यार करने के बाद... अब मैं बिल्कुल शिखर पर हूँ, कामोत्तेजना के कारण मेरा जिस्म फटने को बेताब है...
शैली- मैं ख़ुद भी इसी आग में जल रही हूँ, तभी तो तुमसे कहती हूँ की मुझे प्यार करो , मगर सुनो तब ना...तुम्हें तो प्रणय क्रीडा में कम और राजेश कि९ बातों में ज्यादा मजा आ रहा है... जासूस की तरह हर बात पूछ रहे हो... मर गया सो मर गया.... अब जो जिन्दा हैं उनका भी कुछ ख़याल कीजिये...
दीपू रुका नहीं ... वह उस पर भूखे भेदिये की तरह टूट पडा... जब दोनों के बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे तो वासना की चिंगारियां फूटने लगीं... मन में हजारों रंग बिरंगे फूल खिलने लगे...दिल से निकली आवाज दिल की गहराइयों में उतर रही है, इश्वर सब सुन रहा है, हम दोनों के मन की मुराद जरूर पूरी होगी... मैं तुम्हें पूरी आजादी दूंगा , पूरा सम्मान दूंगा... शैली- मैं समझ सकती हूँ... तुम्हारे जज्बात पाक साफ़ हैं, तुम्हारे विचारों में पवित्रता झलक रही है.... दीपू- तुम बहुत भावुक हो... ऊपर से कठोर दिखती हो मगर अन्दर से नारियल की तरह हो... बिल्कुल शुद्ध , निर्मल और मुलायम... बेहद मधुर और शीतल-शीतल...... शैली- मेरी इतनी तारीफ़ भी न करो किमैं घमंडी हो जाऊं.... मुझे अंहकार पसंद नहीं है.... दीपू- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मैं जान गया हूँ तुम्हें... तुमने अपने सम्मान की खातिर राजेश की ह्त्या करदी यह बहुत बड़ी बात है... मैंने सुना है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा जुल्म सहने वाला गुनाहगार होता है, तुमने जुल्म का प्रतिकार करके यह सिद्ध कर दिया कि तुम आत्मसम्मान कि रक्षा करने के लिए कुछ भी कर सकती हो...बहादुर लोग ही ऐसा कर सकते हैं... शैली- क्षण भर का आवेग था जो हो गया सो गया... वैसे बहुत पछता रही हूँ मैं... दीपू- तुम्हारी जगह कोई दूसरी औरत होती तो जीवन भर उस राजेश और रवि की गुलाम बनी रहती... तुम्हें अपने निर्णय पर गर्व होना चाहिए... खुश होना चाहिए तुम्हें.... शैली- सच कहूं तो मेरा दिल बहुत जोर-जोर से धड़कता है, पश्चाताप कि चिंगारियों में मेरा वजूद झुलस रहा है... मैंने उस आवेग में आकर राजेश को मौत के घाट तो उतार दिया लेकिन अब बहुत दुःख होता है... कभी जब राजेश वाली बात याद आती है तो बहुत ग्लानी होती है... मन उचाट जाता है... दीपू- क्यों ? मन पर इतना बोझ क्यों ? जब उसे मारा तब नहीं सोचा था क्या ? शैली- नहीं, सब अचानक हो गया ....तुम जानना चाहते हो कैसे हुआ ये सब .... मैंने योजना को अंजाम तो धीरे -धीरे दिया मगर योजना अचानक बन गयी... दीपू- अब मैं हर बात सुनूंगा मगर प्यार करने के बाद... अब मैं बिल्कुल शिखर पर हूँ, कामोत्तेजना के कारण मेरा जिस्म फटने को बेताब है... शैली- मैं ख़ुद भी इसी आग में जल रही हूँ, तभी तो तुमसे कहती हूँ की मुझे प्यार करो , मगर सुनो तब ना...तुम्हें तो प्रणय क्रीडा में कम और राजेश कि९ बातों में ज्यादा मजा आ रहा है... जासूस की तरह हर बात पूछ रहे हो... मर गया सो मर गया.... अब जो जिन्दा हैं उनका भी कुछ ख़याल कीजिये... दीपू रुका नहीं ... वह उस पर भूखे भेदिये की तरह टूट पडा... जब दोनों के बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे तो वासना की चिंगारियां फूटने लगीं... मन में हजारों रंग बिरंगे फूल खिलने लगे... कुछ समय तक तो वे आपस में प्यार करते रहे और फ़िर जल्द ही दोनों एक दूसरे में समा गए... ये बेहद आत्मीय क्षण थे...कुछ समय तक तो वह आहिस्ता आहिस्ता दौड़ रहा था मगर जब शैली ने उसको ललकारा तो उसने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी... इस मिल्सं का आनंद अलग था... शैली तो दीवानी बन कर गयी.... दीपू पर भी गज़ब का नशा सवार था ... वह शक्तिमान की तरह व्यवहार कर रहा था... और फ़िर इस खेल में जीत का सेहरा भी दीपू के सर पर ही बंधा... वह जीत की इस खुशी को संभाल नहीं पा रहा था... शैली ने भी कहा-
- मुबारक हो दोस्त् , तुमने मेरा दिल पहले ही जीत लिया था और अब बदन भी जीत लिया... बहुत कम लोग मुझे संतुष्ट कर पाते हैं...
दीपू- तुमने भी तबियत खुश करदी , मैं बहुत आनंदित हूँ...

1 comment:

alka mishra said...

प्रिय बन्धु
जय हिंद
साहित्य हिन्दुस्तानी पर पधारने के लिए धन्यवाद
आपकी तडप बहुत लम्बी है
अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें