Thursday, June 18, 2009

तड़प, भाग-68

अब तक तो थोडी बहुत असलियत यह भी समझ चुका होगा , क्यों भाई पहलवान कुछ सुन रहे हो ?
दीपू- जी हाँ, मैं जानता हूँ ... जानबूझकर ही हम दोनों ने शादी करने का फैसला किया है... आपको भी बुलायेंगे हम... जरूर आना... ये बात हम ग़लत नहीं कह रहे हैं....
हवलदार- अच्छा....... तो अब सब राजा हरिश्चंद्र बन्ने लगे हैं, सच बोलने लगे हैं, जब खाल उधेड़कर उसमें भूसा भरा जाएगा तब तुम तोते की तरह बोलोगे... अभी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है... सोचते होंगे की हम सीधे दिखाई देते हैं इसलिए कुछ नहीं कहेंगे... मगर तुम लोग ये नहीं जानते की हमने एक से बढ़कर एक खतरनाक अपराधियों को कब्जे में किया है... तुम लोग भी भागने की कोशिश मत करना ... एक सयाने ने इसी खिड़की से कूदकर भागने की कोशिश की थी , बेचारा पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया... क्या मिला होशियारी दिखाके... कुछ फायदा हो तब रिस्क लो न... फोकट में जान देने से क्या फायदा ? बराबर न ?
दीपू- क्या चाहते हैं आप लोग ? आख़िर हमने आपका क्या बिगाडा है ?
हवलदार- हाँ, अब आए न लाइन पर... ये सवाल तो तुम पहले भी पूछ सकते थे...जान तो तुम भी गए होंगे...
शैली- अगर जानते तो क्यों पूछते ?
हवलदार- ठीक है, अपने यार से बाहर जाने को कहो , मेरे साथी हवलदार के साथ... मैं तुम्हारे साथ थोड़ा सा मजा ले लूँगा... इसके बाद मेरे साथी को खुश कर देना... बस ,, और हमें क्या चाहिए....
शैली- मुझे भूल जाओ हवलदार... मैं अब अपना घर बसाने वाली हूँ... अगर पैसे की बात करते हो तो लेलो...
दीपू- आप लोग समझते क्यों नहीं है , अगर कोई सुधरना चाहता है तो उसे मौका क्यों नहीं देते... अगर कोई दल दल से निकलकर अपने नई जिन्दगी शुरू करना चाहता है उसे प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए...
शैली- मैं अगर चुप हूँ तो सिर्फ़ अपने दोस्त की खातिर... यह सीधा सादा है , इसने ऐसी दुनिया नहीं देखी ... मैं दिखाना भी नहीं चाहती... वरना मुझे पुलिस ठाणे और कोर्ट कचहरी का खूब ज्ञान है... तुम्हारे विभाग के कितने ही अधिकारी मेरे इन पैरों पर पड़े गिडगिडाते हैं... भले ही यहाँ के सीनियर का तबादला हो गया है... मगर वह जो भी होगा तो इंसान ही होगा न...
हवलदार- हाँ है तो इंसान ही, मगर तुम्हारे किसी काम का नहीं है... तुम उसके किसी काम नहीं आ सकतीं क्यों वह मर्द नहीं औरत है... वो भी एकदम कड़क.... समझौता नहीं कर सकती... रिकोर्ड है उसका...
शैली- अच्छा , तब तो और भी अच्छी बात है, मैं उन्हें बताउंगी तुम्हारे बारे में...
हवलदार - कान की इतनी कच्ची भी नहीं हैं... एक वैश्या की बात पर इतनी जल्दी यकीन नहीं कर सकतीं...
शैली- क्या वैश्या इंसान नहीं होतीं, उनका ईमान नहीं होता, उनका कोई भगवान् नहीं होता, क्या उनके सीने में दिल नहीं होता , अरमान नहीं होते, क्या उन्हें शादी करने का हक़ नहीं, मुख्य धारा में आने का हक़ नहीं ?
हवलदार अच्छा दय्लोग है... पसंद आया... अगर इसे फ़िल्म में दाल दिया जाए तो खूब तालियाँ बजेंगी इस पर... सचमुच जज्बात को झकझोर देने वाला दैलोग है... घाट -घाट का पानी पीती हो रोज ... सब सीख जाती होंगी... नए नए लोग मिलते हैं रोज... खूब मौज मस्ती करने को मिलती हैं, इसलिए अच्छे अच्छे डायलोग सूझते हैं... अब तुम्हारे ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कर लेता हूँ... हर अखबार में तुम लोगों के फोटो मैं ख़ुद छपवाऊंगा... बड़ा मजा आएगा देखकर ...;
शैली- अगर मैंने भी तुम्हारा नाम सरनाम नहीं किया तो मेरा नाम नहीं... मैं भी अगर अपने पर आ गयी तो बलात्कार का मुकदमा लगवा सकती हूँ, चाहे जो हो जाए...
हवलदार- तुम्हारे इस यार की जिन्दगी ख़राब कर देंगे हम...
दीपू- होश में बात करना हवलदार... अगर एक थप्पड़ मारा तो बहरा हो जाएगा...








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