अब ज़रा भी दूरी सही नहीं जाती... अब दिल की इस तड़प को हमेशा के लिए ख़त्म करदो... यह आग सी लगी है , इसको बुझा डालो... इस बेचैनी को हमेशा के लिए मितादो मेरी जान... मेरा सहयोग करो... मुझमे समा जाओ....
शैली- हाँ, इस आग को बुझाने की नहीं अभी तो और भी ज्यादा भड़काने की जरूरत है... जब तन और मन सुलगने लगेंगे तभी इश्क का असली सुख हासिल होगा...
दीपू- अच्छा... अगर ऐसा है तो इस आग को और ज्यादा भड़काकर देखो, सुकून मिलना चाहिए चाहे जैसे मिले...
शैली- तुम उसकी फ़िक्र मत करो... मेरी गारंटी है... जब तुम मेरे कहने से यहाँ आ ही चुके हो तो तुम्हें इसका अफ़सोस नहीं होने दूंगी, ऐसा आनंद दूंगी जो भविष्य में मेरे सिवाय और कोई अन्य लड़की नहीं दे पाएगी....
दीपू- मुझे दूसरी या तीसरी लड़की से क्या मतलब है , जब तुम हो तो मुझे और कुछ नहीं चाहिए...
शैली- अब तुम ये बताओ की इसी होटल में ठहरना है या फ़िर किसी दूसरी जगह पर चलना है ?
दीपू- जो भी आदेश हो , मैं तैयार हूँ... भले ही यहाँ रहो या फ़िर किसी दूसरे होटल में... मैं सोचता हूँ की दूसरे होटल में भी तो इस तरह की गडबडी हो सकती है....कोई और रास्ता नहीं है क्या ?
शैली- फ़िर किसी का घर देखना पड़ेगा... खाने -पीने की चीजें पहले से ही अपने साथ ले जानी होंगी...
दीपू -मेरी नजर में है ऐसा एक घर... बँगला है बहुत बड़ा... उसके मालिक एन आर आई हैं, ज्यादातर बाहर रहते हैं, उस बंगले की जो देख रेख करता है वह मेरा दोस्त है... वह हमको वह बँगला उपलब्ध करा सकता है...
शैली- जिस बंगले का मालिक बड़ा आदमी हो वह हमें उसे कैसे दे सकता है...
दीपू- थोड़े से पैसे कमाने के लिए ... बंगले का मालिक तो यहाँ है नहीं... हम अगर उसको कुछ दे देते हैं तो वह भी हमारी मदद कर सकता है... एक बार तो मैंने अपने एक जान पहचान वाले को सीरियल की शूटिंग के वास्ते भी उस बंगले को उपलब्ध करा दिया था...
शैली- फ़िर देर मत करो, वहीं चलते हैं... अगर ऐसी बात है तो वहाँ का मैनेजर हमारे बारे में किसीको बतायेगा भी नहीं क्योंकि उसे ख़ुद भी अपना डर लगा रहेगा... यहाँ मुझे कुछ ठीक माहौल नहीं लग रहा... मुझे लगता है की पुलिस अधिकारियों के तबादले के कारण ही यह कार्रवाई हो रही है... जब भी कोई नया अफसर आता है तो वह अपनी धाक जमाने और हफ्ता बढ़ाने के लिए ये सब नाटक करता है... चलो मैं बिल चुका देती हूँ... पहले तुम यहाँ से बाहर निकल जाओ , मैं तुम्हारा अहित नहीं देख सकती...
दीपू कपड़े पहनकर कमरे से निकल गया... बाहर बहुत गहमा गहमी थी... पुलिस ने होटल को चारों तरफ़ से घेर रखा था... दीपू ने एक पुलिस अधिकारी से कुछ कहा और आराम से बाहर निकल गया...कुछ देर के बाद शैली भी होटल छोड़ चुकी थी और उसे भी किसीने नहीं रोका...दीपू टेक्सी रुकवाकर खडा हुआ था...
शैली ने फुर्ती से कदम बढाए, टैक्सी सड़क पर फराते भरने लगी... मालाड पश्चिम के मार्वे रोड स्थित एक बंगले में टैक्सी प्रवेश कर गयी... बेहद खूबसूरत था बँगला... शैली ने टैक्सी का बिल चुकाया और चाभी लेकर एक कमरे में घुस गए... शैली ने अपने बैग से शराब की एक बोतल निकाली और पैग बनाने लगी... बंगले में हर साजो सामान था, सभी सुख सुविधाएं थीं... दीपू ने राहत की साँस ली... चीयर्स बोलने के साथ ही हलक तर होने लगे... नशे का झोंका खूब जोर से चलने लगा...काम वासना की आंधी में उन दोनों आशिकों का वजूद हिलने लगा... दीपू उसके होटों को चूमते हुए बोला-
-अब यहाँ कोई दिक्कत नहीं है... खूब प्यार करेंगे... यहाँ हमें टोकने कोई नहीं आएगा... और अगर आया भी तो अब पिटेगा... छोदुँगा नहीं किसीको...
शैली- हम यहाँ तकरार करने नहीं, प्यार करने आए हैं...
Monday, June 22, 2009
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