- यूं ब्लडी ... आई एम् एसीपी , सीबीआई.... यूं कैन गो नाव ....
और फ़िर एक हैरत करने वाली घटना हुयी ... दोनों हवलदारों ने एडियाँ रगड़कर उसे जोरदार सेल्यूट किया और फ़िर माफी मांगने लगे... थोड़ी देर गिदगिदाने के बाद उन्होंने शैली से भी क्षमा मांगे... दीपू ने कहा-
-ये भी इंसपेक्टर हैं, एक ख़ास मिशन में मेरी सहयोगी है और मंगेतर भी ... अब तुम जा सकते हो...
हवलदार का गाल सुन्न हो चुका था, मगर इसके बावजूद भी वह कुछ बोला भी नहीं... चुपचाप चेहरे को मसलता हुआ कमरे से बाहर निकल गया... अब उसे अपनी नौकरी की चिंता सता रही थी, जिस जोड़े को वे लोग अपना बकरा समझ रहे थे, वह तो मधुमक्खियों का छत्ता था.... जान बची और लाखों पाये... शैली का दिमाग भी काम नहीं कर पा रहा था, जिस तरह उसने अपने तेवर दिखाए थे वे पुलिस से जुड़े लोगों के ही होते हैं, तो क्या दीपू किसी ख़ास मिशन पर काम कर रहा था, क्या वह वास्तब में सीबीआई का अधिकारी था, क्या सचमुच वह उसकी किसी जांच के लिए आया था ? एक बार के लिए तो वह अन्दर तक काँप गयी... किसी अनहोनी की आशंका से उसका बुरा हाल था... जब दीपू दरवाजा बंद कलरके आया तो देखा की शैली की आँखें फटी हुई थीं... वह उसे हैरत से देख रही थी... दीपू उसके दिलो दिमाग में उठ रहे तूफ़ान को भांप गया... हलके से हंसकर पूछने लगा-
-अब क्या हुआ मेरी जान को ? कोई तुम्हारे बारे में अनाप -शनाप बोले तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा...
शैली- कौन हो तुम ? किसने भेजा है तुम्हें यहाँ ? सच -सच बताना ... मैं झूठ नहीं सह सकती ... झूठे आदमी के साथ एक पल बिताना भी मेरे लिए असहनीय है... अब जल्दी से बोलो मैं ज्यादा इन्तजार नहीं कर सकती...
दीपू- तुम शक कर रही हो मुझ पर... अच्छा... समझ गया... उस हवलदार के सामने डायलोग मार दिया , इसलिए क्या ? अरे और क्या करता , अगर झूठ नहीं बोलूँ राजा हरिश्चंद्र बना रहूँ तो इज्जत लूट लेते वे दोनों...
शैली - अजी हाँ, लूट लेते इज्जत ... पेट फाड़ देती उन दोनों का...
दीपू - इससे क्या फायदा होता... तुम्हें जेल हो जाती ... अब मैंने सस्ते में ही सब कुछ निबटा दिया न... ऐसे देखा जाए तो मैंने तुम्हें भी इंसपेक्टर बताया था , तो क्या हो गईं तुम इंसपेक्टर ? अगर एक ज़रा सा झूठ बोलने से किसीकी इज्जत बच सकती है... बहुत बड़ा बखेडा बच सकता है, तो यह ग़लत नहीं है...
शैली- मुझे तुम्हारी आंखों में पुलिस अधिकारियों वाली चमक ही दिखाई दी... इसलिए डर गयी थी... सोरी यार , माफ़ करदो मुझे ... आई लव यूं ... मेरी इज्जत बचाने के लिए शुक्रिया ....
दीपू - अपनों से नहीं गैरों से कहते हैं इस शब्द को... यह पराया शब्द लगता है....
शैली- हाँ .... अब हम चलेंगे यहाँ से ... अच्छे खासे रोमांटिक मूड की ऐसी की तैसी हो गेई....
दीपू- तुम्हें इसकी फ़िक्र करने की जरूरत नहीं है...
इतना कहते ही उसने उसने शैली को अपनी बांहों में भर लिया... वह उसके होठों को चूसने लगा... कुछ ही देर में गरमी का माहौल पैदा हो गया... जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गयी...शैली भी उससे ऐसे लिपटी जैसे की अगर उसे ज़रा भी ढीला छोड़ दिया गया तो वह उससे हमेशा के लिए जुदा हो जाएगा...
No comments:
Post a Comment