Sunday, June 7, 2009

तड़प, भाग-57

समझ रही हो ना... वहाँ फोकट खाने वाले लोग नहीं हैं... प्यार मोहब्बत ठीक है, मगर ये सब खोखले शब्द होते हैं... इनकी कोई प्रमाणिकता नहीं होती, कोई प्रतिबद्धता नहीं होती... मैं किसीके प्यार पर शक नहीं कर रही, किसीकी बुराई करने का भी सवाल नहीं ... इसमे कोई डाउट नहीं किराजेश जैसा लड़का आज की तारीख में मिलना मुश्किल है... इसके बावजूद ज़माना तो अपनी रफ़्तार से चल ही रहा है , उसे तो कोई रोक ही नहीं सकता... मेरा इशारा समझ रही हो न तुम ? इसीलिए कह रही हूँ कि लाइफ सेफ करो...
शैली- मुझे शराब चढ़ने लगी है , अब नहीं समझ पाउंगी... राजेश मेरा पहला और आख़िरी प्यार है ... उसके बिना जीने कि कल्पना भी नहीं कर सकती... मुझे नहीं लगता कि राजेश मुझे मुंबई जाने देंगे... एक दिन नहीं देखते तो परेशान हो उठते हैं...
रोजी- तुम्हारा नाम तो भोली होना चाहिए , शैली किसने रख दिया... तरस आ रहा है तुम पर ...
शैली- तुम मुझे समझा रही हो, बहका रही हो या फ़िर डरा रही हो... कर क्या रही हो तुम ?
रोजी- मैं tumhaaree बड़ी बहन जैसी हो , मुझे तुमसे लगाव हो गया है, तुम बहुत अच्छी लगने लगी हो... इसलिए तुम्हारे हित कि बात कर रही हूँ... मैं तुमसे कुछ न कुछ बड़ी ही हूँ... तुमसे कोई दुश्मनी भी नहीं... दुशमनी होती तो तुम ये कयास लगा सकती थीं कि मैंने इसलिए तुमसे येसब बातें कही हैं...
रोजी- अभी तो तुम हमारे गाँव में ही ठहरी हो, कल अपने घर बुलाऊंगी तुम्हें, फ़िर फुर्सत में बात करेंगे... अभी तो खाने पीने में मजा आ रहा है... इस मजा को किरकिरा क्यों करें... मैं आभारी हूँ जो तुमने मेरे बारे में इतना सोचा वरना आजकल लोगों को अपने आप से ही फुर्सत नहीं है...
रोजी- इसमें आभार जैसी कोई बात नहीं है, जीवन भर हमें एक दूसरे की भलाई करनी है....
शैली- क्या तुम्हारी शादी हो चुकी है ?
रोजी- नहीं ... पहले कैरियर बाद में शादी कि बात सोचेंगे,, वैसे भी इस झगडे में पड़नेकी जरूरत ही क्या है... भले ही मैं कुंवारी हूँ मगर शादीशुदा लड़कियों से अच्छी हूँ... मैं कोई भी रात बेकार नहीं जाने देती... हर रात मैं जिस्मानी सुख लूटती रहती हूँ... इसके बिना मेरा चलता ही नहीं... मुझे नए नए मर्द पसंद हैं... थके हारे मरियल लोग मुझे ज़रा भी नही भाते ... मुझे चाहिए ऐसे जवान मर्द जो मुझ पर पूरी तरह हावी हो जाएँ और मेरी चीख निकल्वादें.... मैं चीखती चिलाती राहों और वे हमला पर हमला करते रहें...
शैली- ऐसा करने से दुःख नहीं होता तुम्हें ?
रोजी- बुल्कुल नहीं, मुझे उग्र सहवास ही पसंद है... मुंबई में एक विदेशी जिगोलो है, वह एक रात की फीस दस हजार लेता है मगर ऐसा सुख देता है कि तन के साथ साथ मन भी खुश हो जाता है ...
शैली- तुम उसे उल्टे दस हजार देती हो , कमाल है...
रोजी- इसमें हैरत की क्या बात है , पैसा या तो स्वाद के लिए होता है या फ़िर बात के लिए लिए...
शैली- इतने रुपये लाती कहाँ से हो ?
रोजी - बहुत आसान है, जब कोई दोस्त मेरे इस बदन से खेल खेलना चाहता है तो मैं उससे दस कि जगह बीस मांग लेती हूँ और फ़िर अगली रात मजे से उस विदेशी के साथ गुजारती हूँ... बहुत ताकतवर है वो... कभी तुम मुंबई आओगी तो अपने खर्चे से मिल्वौंगी उससे... मान जाओगी तुम...
शैली- आह,..... तुम्हारी गर्म बातें सुन सुनकर मैं भी गर्म हो गयी हूँ...

No comments: