रोजी- अगर ये बात है तो जल्दी से राजेश को बुलाना पड़ेगा मगर ऐसा सम्भव नहीं है ... क्योंकि वह भी तो रवि के साथ पडौसी गाँव गया हुआ है ... अब क्या करें... हाँ, अगर चाहो तो मैं तुम्हें संतुष्ट कर सकती हूँ...
शैली- संतुष्ट और मुझे ? मगर तुम कैसे ? जो मेरे पास है, तुम्हारे पास भी तो वही है...
रोजी- ओह....मैंने हर तरह की ट्रेनिंग ले राखी है, सब कुछ जानती हूँ... लेकिन अभी तुम्हें जमेगा नहीं... मर्द की नई आदत लगी है, यह बदलते -बदलते ही बदलेगी... फिलहाल तुम्हें एक ख़ास मर्द की जरूरत है...
शैली- तुमने रवि और राज को तो पहले ही जाने दिया , अब कहती हो की मर्द की जरूरत है....अरे याद आया ... तुहें तो हर रात एक मर्द हर हालत में चाहिए ही ना... अब कैसे करोगी तुम ?
रोजी- मेरी चिंता छोडो... मैंने अपने एक दोस्त को बुला लिया है... गज़ब का है, पैसेवाला भी है... मौज मस्ती के बाद वह ईनाम भी खूब देता है... बस थोड़ा सा सनकी है... जैसे उसकी इच्छा होती है, वह वैसे ही सम्बन्ध बनाता है... समझ रही हो न... थोड़े से नए -नए प्रयोग क्लार्ता रहता है, अगर उतना संभाल लिया तो फ़िर किसी बात की चिंता नहीं... रंगीन मिजाज आदमी है... तुम चाहो तो एक या दो बार मजा ले सकती हो... मुझे बुरा नहीं लगेगा... बहनों की तरह हम दोनों दोस्त भी मिल बांटकर खा लेंगी...
शैली- राजेश को पता चला तो ? बहुत बुरा लगेगा उसको... मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती...
रोजी-० पागल हो गयी हो... उसे क्यों लगने लगा बुरा ? उलटा वह खुश हो जाएगा... अगर तुम तरसती रहीं तब उसे तकलीफ होगी... वह और रवि दोनों आज एक ख़ास हसीना को कली से फूल बनाने वाले हैं... अगर राजेश कहीं भजन कीर्तन करने गया होता तो मैं भी मान लेती .... वह भी प्रणय क्रीडा के समुद्र में गोते लगा रहा होगा...
शैली- तुम मुझे मुंबई वाले उसे जिगोलो से कब मिल्वाओगी जो चीख निकलवा देता है ?
रोजी- बहुत जल्द.... तुम वहाँ चलने की तैयारी करो... तुम्हारे रहने सहने कमाने खाने की सब जिम्मेदारी मुझ पर रही... वहाँ कोई परेश्गानी नहीं है... रवि करेगा हमारी मदद...
शैली- कितनी अच्छी हो तुम ? मैंने पहली बार में यह नहीं जाना था...
रोजी- कोई बात नहीं मेरी जान... तुम हो ही इतनी प्यारी चीज की हर कोई तुम्हें देखकर दीवाना हुए बिना नहीं रहता... तुम बे इन्तिहाँ हसीं हो... थोड़ा सा हुनर सीखते ही बड़ी कलाकार बन जाओगी...
शैली अपनी ही धुन में कहती चली जा रही थी... दीपू उसका तमतमाया हुआ चेहरा देखता ही रह गया... उसके सुर्ख चेहरे में आज भी गज़ब की चमक मौजूद थी... हाँ आंखों में सवालों का तूफ़ान स्पष्ट दिखाई देता था...वह काफी देर से शैली की आपबीती कहानी सुन रहा था... वह चाहता तो सिर्फ़ राजेश की ह्त्या का कारण पूछकर ही बात ख़त्म कर सकता था लेकिन उसका उद्देश्य था की वह हर छोटी सी छोटी बात भी जानें ताकि यह पता लग सके की शैली ने राजेश की ह्त्या क्यों की ? उसने एक गहरी सांस छोडी और पुछा -
-तुम कुछ थकी सी लग रही हो शैली, मुझे लगता है तुम्हें आराम की जरूरत है ...
शैली- नहीं यार... ग़लत लगता है तुम्हें... ऐसी बात नहीं है... जिन्दगी में आराम तो हरम है... मुझे थोड़ी सी शराब की तलब हो रही है... इसीलिए मेरे होठ सूख रहे हैं... जी मचल रहा है... बेचैनी बढ़ रही है...
दीपू- इसे ज्यादा पीना ठीक नहीं... पहले -पहले तो इसे हम पीते हैं, मगर बाद में यह हमको पीने लगती है...मैंने बहुत लोगों को ऐसा कहते सुना है....
शैली- छोडो भी ... इन लोगों का क्या है , कहते सुनते रहते है, प्यार दो प्यार लो.... इसके सिवाय यहाँ कुछ नहीं है... दुनिया में इंसान एक बार ही आता है, इसके बाद पता नहीं कहाँ चला जाता है... जब हमें चांस मिल ही गया है तो इसका सदुपयोग करना चाहिए...
दीपू- ठीक कहती हो... मैं पैग बनाता हूँ मगर मेरी पीने की जरा भी इच्छा नहीं है... मुझे उल्टी जैसी हो रही हैं...
शैली- अरे मर्द होकर भी ऐसी बात करते हो...
Monday, June 8, 2009
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