Tuesday, June 16, 2009

तड़प, भाग-65

शैली- ठीक कहते हो... इससे यहाँ का मजा कम हो सकता है... मैं ख़ुद भी नहीं चाहती की इस सुख के सामने कोई बाधा आए... बस मैं तो तुम्हारी रूचि को देखते हुए कह रही थी... राजेश के बारे में तुम कुछ ज्यादा जानने के इच्छुक थे... मैं दोस्त हूँ तुम्हारी... अगर मैं तुम्हारी बातों पर ध्यान नहीं दूँ तो कौन देगा...
दीपू- मैं ठहरा गंवार आदमी... मैं इतनी बारीक बातों को समझ नहीं पाता... बस प्यार समझता हूँ...
शैली- प्यार तो इतना दूंगी तुम्हें की अपने आप को भूल जाउंगी...जीवन भर कभी किसीको इतना नहीं चाहा होगा जितना मैं तुम्हें चाहूंगी... मैं वादा कम करुँगी मगर उन्हें निभाउंगी ज्यादा...
दीपू- मैं सिर्फ़ तुमसे प्रेम करता रहूंगा... अगर मेरे सामने कोई परी भी इन्द्रलोक से चलकर आ जाए और नग्न होकर प्रस्ताव रखे तो भी मैं उसके झांसे में नहीं आऊंगा... तुम्हारे लिए सबको अस्वीकृत कर दूंगा... तुम्हारे सिवाय कोई पसंद नहीं है मुझे...
शैली और दीपू सुख के अन्तिम क्षणों में विचरण कर रहे थे... ये बेहद कामुक, सुख भरे और आरामदायक पल थे... दोनों ही तरफ़ से मीठी मीठी बातें हो रही थीं... दीपू का एक -एक शब्द शैली के कानों में रस सा घोल रहा था... उसे अपने आप पर नाज हो रहा था, अपने खूबसूरत जिस्म पर गर्व हो रहा था... उसकी गदराई हुई जवानी की खातिर ही तो वह दीपू के सर चढ़कर बोल रही थी... उसने महसूस किया की दीपू उस पर बुरी तरह से फ़िदा हो गया था...वह सोचने लगी की गर्म लोहे पर ही हथौडा मारना है...दीपू ने अपनी रफ़्तार तेज करदी थी... शैली की आहें गर्म हिने लगीं... ये दर्द की नहीं आनंद की आहें थीं...दीपू के हाथ शैली की गोलाइयों पर थे , उसके होठ शैली के होठों का रस चूस रहे थे... जिस क्षण उसके होठ शैली के होठों से अलग हटते थे , तभी उसकी आहें सुनाई पड़ती थीं... यह बेहद हसीं क्षण थे... दीपू की भावनाओं को और भी कामुक करने के उद्देश्य से शैली ने कहा-
- आह्ह्ह्ह... बहुत अच्छा लग रहा है, काश यह वक्त यहीं पर रुक जाए और जब भी दम निकले तो ऐसे ही सुखी क्षणों में, तुम्हारी बांहों में निकले ...
दीपू- ये क्या कह रही हो, ये पल खुशी के हैं, अच्छी- अच्छी बातों को करने के हैं और तुम कैसी कैसी बात कर रही हो.... तुम मेरे जीवन का एक ख़ास हिस्सा हो, मेरी जिन्दगी बन गयी हो तुम... जिस तरह खुशबू को फूल से अलग नहीं किया जा सकता ठीक उसी तरह हम दोनों को भी जुदा नहीं किया जा सकता ...
शैली- अगर तुम्हारी घरवाले इस रिश्ते से नाखुश हुए तब क्या होगा ?
दीपू- ऐसा कभी नहीं होगा...मेरी माँ इनकार नहीं कर सकती... बहुत भोली है वो... सिर्फ़ मेरी खुशी चाहती है... मुझे खुश देखने के लिए अकेली गाँव में रह रही है...पिता तो बचपन में ही चल बसे थे...
शैली- ओह.... फ़िर तो बहुत तकलीफ होती होगी ?
दीपू- हाँ , बहुत तकलीफ होती थी, अब सब सुधर गया है, तुम मिल गयी हो तो और भी सब कुछ ठीक ठाक हो जाएगा... हम लोग गाँव के हैं, स्वाभिमानी हैं...
शैली- मुझे भी इसी तरह के लोग पसंद हैं... हम शादी करने के बाद तुम्हारी मम्मी को भी यहीं बुला लेंगे...
दीपू- बाद की बातें बाद में सोचेंगे, ऐसा सोचने के लिए शुक्रिया...
शैली- मोहब्बत मी इस तरह शुक्रिया नहीं कहा जाता... यह शब्द थोड़ा सा हल्का लगने लगता है...
थोडी देर के बाद दीपू ने अपनी रफ़्तार कम करदी ... यह मोहब्बत की इन्तिहाँ थी... वे दोनों संतुष्टि की तरफ़ बढ़ रहे थे... शैली के चेहरे पर सुख और सम्पूर्ण संतुष्टि के भाव saaf देखे जा सकते थे... जब कामोत्तेजना का तूफ़ान गुजर गया तो दोनों एक दूसरे में समा गए... दीपू बार बार शैली के चेहरे को चूमकर अपने प्यार का प्रदर्शन कर रहा था...शैली भी जोश में थी...

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