Tuesday, June 23, 2009

तड़प, भाग-72

जब हमको प्यार से फुर्सत मिलेगी तभी तो तक्राक के बारे में सोचेंगे...
दीपू- जो प्यार के बीच आया और तकलीफ देने की कोशिश की मैं तब एक्शन की बात कर रहा हूँ... वरना मैं ख़ुद लड़ाई झगडे से डरता हूँ, मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगता की हिंसा हो, मारपीट हो और बेवजह का झमेला खडा हो...
शैली- मुझे एक बाट्स ऐ हैरत हो रही है... तुम्हें नहीं लगता दीपू ?
दीपू- जब तक कहोगी नहीं मैं कैसे समझूंगा, मुझे भी तो जानकारी होनी चाहिए...तुम्हारे चेहरे की मुस्कान चुगली कर रही है की जरूर तुम कोई शरारती बात कहने वाली हो...
शैली- मैं सोच रही हूँ की काफी देर से तुमने मेरे अतीत के बारे में कोई पूछताछ नहीं की....
दीपू- ओह शैली, तुम भी कमाल करती हो वो भी जबरदस्त .... वाह .... मैं जिस बात को भूल गया उसे तुम इस अंदाज में पेश कर रही हो... क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगता की तुम अपने दर्द को किसीके साथ शेयर करो... विशेषकर उसके साथ जो तुम्हारा अपना हो और तुम्हारी भावनाओं को अच्छी तरह से समझ सके...
शैली- हाँ , इच्छा तो होती है... तुम्हें बहुत कुछ बता भी चुकी हूँ... हमारे गाँव के सबसे धनी ठाकुर के बेटे राजेश ने मुझे अपने प्यार के जाल में ऐसे उलझा लिया था मानो वह सचमुच ही मुझ पर जान छिड़कता हो... उसने मुंबई शहर से अपने एक दोस्त को बुलाकर मेरे साथ खूब इंजॉय करवाया , यहाँ तक की गाँव की अन्य कई कम उम्र की लड़कियों को भी उसने मेरे माध्यम से अपना शिकार बनाया ... मैं चुप रही... मैंने सोचा यही प्यार है... उसने मुझे नशे की लत लगादी थी... इसी कारण मैं हर बुरे को सही और सही को ग़लत समझ बैठी थी... मुझे लगता था की शरीर का सुख ही दुनिया का सबसे बड़ा सुख है... मेरी सोच थी की जिन्दगी में और रखा ही क्या है जितना चाहो मजा लो, बाद में तो इस जिस्म को मिट्टी में ही मिल जाना है... और मेरी इस विचारधारा के पीछे राजेश का ही महत्वपूर्ण योगदान था...उसीने कूट कूटकर मेरे दिलोदिमाग में यह बात घुसा दी थी... वह मेरी उम्र का ऐसा पड़ाव था जहाँ एक बार कदम बढ़ाने पर फ़िर पीछे लौटाना बेहद मुश्किल हो जाता है... मेरे साथ भी यही तो हुआ... मैं कामवासना की भट्टी में जलती चलती गयी... तन और धन के हवसी भेदिये मेरा फायदा उठाते रहे ... मैं जिनको दौलतवाला समझती थी, समाज में ऊंचा रसूख रखने वाला समझती थी वही लोग सबसे खतरनाक थे... वे सफेदपोश भेदिये थे... उनके चेहरे पर दूसरे चेहरे लगे हुए थे... ऊपर से दिखने में जो सज्जन थे वे अन्दर से उतने ही दुर्जन निकले... जिनका समाज में सबसे ज्यादा आदर था वे उतने ही पापी निकले...
दीपू- तुम्हारी तड़प बता रही है की उन्होंने तुम पर बहुत जुल्म किए हैं....
शैली- हाँ, इतने की जिन्हें शब्दों में बयान करना सम्भव नहीं है... मेरे सीने के घाव तो तुम आसानी से देख सकते हैं लेकिन आत्मा पर जो घाव हैं उन्हें नहीं देख पाओगे , ये कभी नहीं भरने वाले जख्म हैं...
दीपू- ऐसे लोगों के लिए सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए.... कम से कम फांसी की सजा हो तब लोग इससे सबक सीख सकें, जब किसी खतरनाक अपराधी को उसके कुकर्म की सजा नहीं मिल पाती तो समाज में यह संदेश जाता है की बड़ा से बड़ा जुर्म करने पर भी आसानी से लेदेकर बच्चा जा सकता है...
शैली- हाँ .... मेरे ख़याल से कोई इससे भी बड़ी सजा होनी चाहिए ताकि कोई ऐसे कुकर्म को दोहरा नहीं सके...
दीपू ने महसूस किया की माहौल गंभीर होता जा रहा था, इसी कारण उसने शैली की गोलाइयों से अपने होठ स्पर्श कर दिए... जोर दार धमाके होने शुरू हो गए...








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