Monday, June 15, 2009

तड़प, भाग -64

जब वह बड़ी हुयी तो मर्दों के साए से भी डरने लगी , मगर कमबख्त राजेश ने उसके बदन में ऐसी आग लगाई की वह टूटकर बिखर गयी... खुशी-खुशी उसको अपना शरीर समर्पित करने लगी... जब इससे भी राजेश का पेट नहीं भरा तो उसने शैली को अपने दोस्तों के सामने परोसना शुरू कर दिया... शैली को उसने एक ऐसे जाल में उलझाकर रख दिया की वह कुछ भी नहीं समझ पाई और दल-दल में डूबती चली गयी... यह सिलसिला यहीं ख़त्म नहीं हुया... राजेश ने शैली को अपने दोस्तों के सामने परोसना शुरू कर दिया था , अब वह शराब और सिगरेट पीने में माहिर हो चुकी थी... जब भी शैली को नशे की तलब लगती, उसको दौड़कर राजेश के पास पहुचना पड़ता था... जब वह सोती तो यह कसम खाती की अगले दिन से वह इन सब कामों को छोड़ देगी लेकिन अगली रात वह फ़िर राजेश की शरण में आ जाती... राजेश जिस दोस्त के साथ चाहता उसको सुलाता था... पीने के बाद तो ख़ुद शैली को भी होश नहीं रहता था की वह क्सिके साथ सम्बन्ध बना रही है... उसको बेहिसाब शराब पिलाई जाती थी, इससे वह ज्यादातर नशे में ही रहती थी और राजेश के दोस्त उसके जिस्म का मनमाफिक उपयोग करते थे... जब वह खामोश होकर सोच रही थी उस वक्त दीपू जोर - जोर से आक्रमण कर रहा था... वह पूरी ताकत का इस्तेमाल कर रहा था... उसको मालूम था की शैली को ऐसा ही सख्त व्यवहार पसंद है... उसे लगा था की शायद शैली सुख का अनुभव कर रही है... तभी चुप है, फ़िर भी उसने एक बार पूछना उचित समझा-
-बहुत देर से चुप पडी हो मेरी जान.... क्या बात है ? कोई परेशानी तो नहीं है ? मेरे ख़याल से इस बार तुम्हें वो सुख नहीं मिल पा रहा है जिसकी तुम्हें तलाश है ?
शैली- नहीं डीयर ... अब मेरी तलाश ख़त्म हो चुकी है, मेरी मंजिल मेरे सामने है... मेरा प्यार मेरी बांहों में हैं, मेरे आगोश में है... अब मुझे दुनिया से कुछ और नहीं चाहिए....तुम कहो अपनी...
दीपू - मैं खूब इंजॉय कर रहा हूँ... यही सोच रहा था की तुम्हारी चुप्पी का क्या कारण हो सकता है ...
शैली- मुझे फ़िर से पुराणी बातें याद आने लगी थीं... कुछ पलों के लिए वहीं खोई थी, मगर आनंद भी ले रही थी... राजेश की गडारी इतनी बड़ी है की उसको बहुत जल्दी नहीं भुलाया जा सकता , भले ही वह मर चुका है लेकिन उसका गुनाह इतना बड़ा है की मैं भी मरने के बाद नहीं भूल सकती... उसने बाकायदा एक साजिस रची थी... इस साजिस में बुरी तरह उलझ गयी मैं... मैंने कभी नहीं सोचा था की गाँव में रहने वाले लोग इस तरह के सदयंत्र में शामिल हो सकते हैं... मैं जितनी पीछे थी लोग उतने ही आगे थे... वहाँ के लोग मुझे भले लगते थे मगर उन्होंने मेरी जिन्दगी को नर्क बनाने में कोई कसार नहीं छोडी...
दीपू- लोग इतने निष्ठुर क्यों होते हैं ? क्या मिला उन्हें ऐसा करके ?
शैली- मेरी जवानी, मेरा यह जिस्म ... इस जिस्म का उपयोग उसने पैसा और पहुच बनाने में किया... उन्होंने पहले मेरे सामने भोलेपन का नाटक किया , फ़िर अपनापन का जाल फेंका और मुझे हमेशा के लिए उलझाकर रख दिया ... मुझे शराब की आदत लगाई गयी ... जब मैं उनके झांसे में आ गयी तो उन्होंने मुझे विधिवत वैश्या बना डाला ... बाकायदा मेरी बुकिंग की जाने लगी ... फ़िर एक समय ऐसा भी आया की वे मेरी ब्ल्यू फ़िल्म बनाने लगे.... इसके बाद तो उन्होंने मुझे ब्लेकमेल करना भी शुरू कर दिया था...
दीपू- पहले यहाँ का मजा लेलो, बाद में उनकी चर्चा करेंगे...

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