Thursday, June 18, 2009

तड़प, भाग-67

अपने दांये हाथ में लगे डंडे को बांये हाथ पर घुमाते हुए वह हवलदार बोला-
- अच्छा , ये बात है... कितने और छिपे हुए हैं अन्दर ? अब समझा ... क्या इसीलिए मैडम हम पर भड़क रही थीं, एसीपी का रॉब झाड़ रही थीं, तुम जैसी दो चार मैडम और मिल जाएँ तो हम तो कर बैठे नौकरी... आपने कितने लोगों को यहाँ पर बुलाकर रखा है ?
शैली- अगर इस तरह की बात है तो फ़िर कुछ लेदेकर मामला रफा दफा करदो... बोलो कितना चाहिए...
हवलदार - इस ग्राहक से तुमने कितनी रकम वसूली है ? जितनी वसूली है उससे दस गुना चाहिए... ठीक है ?
शैली-क्या तुम सच मान सकते हो ?अगर हाँ तो कहूं ,
हवलदार - सच्चाई ? और वैश्या के मुख से ? ऐसा नहीं है... कहाँ होता है ऐसा ? फ़िर भी अगर ऐसा कुछ है तो कहो ...मैं सुनने की कोशिश करता हूँ...
शैली- आज मैं परेशान हूँ इसलिए तुम ऐसी बात कर रहे हो, कभी नाव पानी पर तो कभी पानी नाव पर... तुम इस ग्राहक की कीमत पूछ रहे थे न , इसे मैंने एक पैसा भी नहीं दिया... अब इसका गर दस गुना करना है तो सिर्फ़ दस रुपये होते हैं, मानोगे क्या ?चाहिए दस रुपये ...
उसकी बात सुनकर हवलदार खूब जोर से हंसा... दूसरा हवलदार तो पेट पकड़कर हंस रहा था, शैली और दीपू की समझ में इस हंसी का रहस्य नहीं आ रहा था...वह हैरत से बोली-
- ये क्यों हंस रहे हो तुम लोग ? मैंने ऐसी कौन सी बात कहदी ?
हवलदार- मुफ्त की बात पर हंसी आ गयी है, आज तक नहीं सुना की किसी वैश्या ने कभी किसी ग्राहक से फीस नहीं ली हो... ये तो बिल्कुल असंभव बात है... हम मान ही नहीं सकते...अगर पैसा नहीं दिया तो कैसे हो गया ये सब ? और अगर इसके साथ तुम ऐश कर सकती हो तो हमारे अन्दर क्या कमी है ? आखिरकार हम भी इंसान हैं, चलो तुमसे कुछ नहीं लेंगे... एक बार बस हमें भी अपनी इस कातिल जवानी का स्वाद चखने दो...
शैली- अब मैं यह काम गैरों के साथ नहीं करती... यह मेरा मंगेतर है ... हम लोग बालिग़ हैं और अपनी मर्जी से कमरे के अन्दर आराम कर रहे हैं... क़ानून देखा जाए तो यह कोई गुनाह नहीं होता...
हवलदार- अच्छा, तो अब हमें सिखाओगे क़ानून.... क़ानून के रक्षक हम हैं, भाषण तुम दे रही हो... अच्छा है...
शैली- लेकिन हम तो सेवा पानी भी देने को तैयार हैं... हजार दो हजार रुपये ले लो ... बात ख़त्म करो...
हवलदार- एक एक- बार हमें भी रसपान करने दीजिये... सब कुछ ठीक हो जाएगा... क्या बिगडेगा तुम्हारा ?
शैली- अब मैं कैसे समझाऊँ, मैं यह काम नहीं कर सकती... यकीन मानो मैं झूठ नहीं बोलती...
हवलदार- मैं जानता हूँ...तुम जैसे ना जाने हसीं किस्से सुन चुका हूँ... रोजाना शादी करती हो और रोजाना तलाक लेकर फ़िर यम लोग नई शादियाँ कर ;लेते हो... यह बेचारा सीधा आदमी दीखता है , क्यों इसे बरबाद करती हो ?
क्या यह जानता है की तुम्हारा काम क्या है ?

No comments: