Tuesday, June 9, 2009

तड़प, भाग-58

हम लोग तो जाम टकरा ही लेते हैं, वरना यह काम मर्द लोगों का ही है... एक ही साँस में खींच जाओ , खूब आनंद आएगा... जब तक शराब चढ़ती नहीं तब तक दिल को तसल्ली ही नहीं होती... ये कोई पीना भी पीना है की पूरी तरह होश में रहें और कदम भी नहीं डगमगाएं... ला पिलादे साकिया , पैमाना पैमाने के बाद ... होश की बातें करेंगे होश में आने के बाद...
दीपू- तुम अगर कहो तो जान भी दे दूँ, जहर भी पीलूँ... मुझे तुमसे प्यारा कोई नहीं है... सबसे प्यारी हो तुम...
शैली- तुम्हारी ये मीठी -मीठी बातें ही घायल कर डालती हैं, दिल को चीर डालती हैं... मन में बस गयी है तुम्हारी यह मोहिनी मूरत... मुझसे कभी जुदा ना होना , मुझे भी अपने आपसे से अलग मत करना ... भले ही इससे ज्यादा ना करो मगर इससे कम मोहब्बत कभी मत करना...
दीपू- ऐसा कभी नहीं होगा... मेरी आंखों में भी तुम ही तुम समाई हो, तुम्हारे बिना जीवन में कहीं कुछ नहीं है... दिल की अँधेरी गलियाँ तुम्हारे प्यार से ही रोशन हुयी हैं... अगर यह मोहब्बत न होती तो मैं ना जाने कहाँ होता , तुम ना जाने कहाँ होती... हमारा मिलन इसी तरह लिखा था... बिल्कुल फिल्मी कहानी की तरह... जैसे फिल्मों में अचानक सब हो जाता है, ढाई घंटे में ही सारी दुनिया सिमट जाती है, उसी तरह हमारे साथ हो रहा है...
शैली- मुझे तो कभी कभी डर सा लगने लगता है... सोचती हूँ की इस बार भी ठोकर ना लग जाए... एक बार तो बड़ी मुश्किल से संभली हूँ... और यह संभालना भी कोई संभालना है की इज्जतदार परिवार के घर की लड़की यहाँ मुंबई में टॉप लेबल की काल गर्ल बनकर रह गयी... इससे अच्छे तो चोर उचक्के होते हैं, भिखारी होते हैं... वो लोग कम से कम अपना जिस्म तो नहीं बेचते ,, आत्मा तो नहीं बेचते .... अपना ईमान तो नहीं बेचते... और मैंने क्या किया ? मैंने तो अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया... अपने पास कुछ नहीं रखा... जो कुछ बचा था उसको तुम्हारे हवाले कर दिया... अब क्या करुँगी मैं... समझ नहीं आता...ऐसा नशा हो गया है की जीना हराम होने लगा है...तुम सहारा दोगे तभी जान बच पाएगी...
दीपू- उसकी चिंता मत करो , तुम्हारी जान अब मेरे कब्जे में है... मैं इसकी हिफाजत करूँगा...
इसके बाद उन दोनों ने जाम छलकाने शुरू कर दिए...एक घूँट पीने के बाद दीपू उस हसीना के होठों को चूमता रहता था...शैली जोश में थी...दीपू से कहने लगी-
-जब कोई अपना मिलता है , तो अन्दर से खुशी होती है... अपनापन की खुशबू ही अलग होती है... वफ़ा के रंग सबसे चटखदार होते हैं... अब तक मैं इस प्यार के साए से बहुत दूर थी... जीवन नीअर्स होने लगा था... बस एक तरह से ही जी रही थी, सुबह देरी से जागना फ़िर कस्टूमर के बताये पते पर पहुचना... शराब पीना , जिस्मानी खेल खेलना और फ़िर देर रात तक यही सिलसिला चलता रहता था... इसके बाद अगले दिन भी वही दिनचर्या ... अब मैं ग्राहकों के साथ -साथ तुम्हारा भी विशेष ध्यान रखा करुँगी... पहले तो सिर्फ़ पैसे से मतलब होता था... अब अपने सबसे प्यारे दोस्त से भी मतलब रखूंगी...
दीपू- मैं भी ही मारा -मारा फिरता था... कटी पतंग की तरह... अब मैं भी समझूंगा की इस शहर में मेरा अपना भी कोई मौजूद है... जो मेरे दुःख से दुखी और सुख से सुखी हो सकता है...
दीपू- सच दीपू... तुम्हारे अंतर्मन से भी यही अआवाज निकल रही है ... कितनी खुश नसीब हूँ मैं... और क्या चाहिए मुझे, इतना प्यार तो जान न्यौछावर करने पर भी नहीं मिल सकता...
दीपू- तुम जैसी कातिल हसीना भी आसानी से नहीं मिल सकती ... ऐसी गदराई हुयी जवानी पर कोई भी अपनी जिंदगानी लुटाने को तैयार हो सकता है...

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