मैं नाचीज ठहरा... मेरा क्या है, तुम्हें देखकर तो अच्छे अच्छे ज्ञानी-ध्यानी पुरूष भी अपना ईमान डिगाए बिना नहीं मानेंगे... अरे पागल हो जायेंगे... ऐसा जादू है तुम्हारे चेहरे में, तुम्हारे जिस्म में और इस जवानी में ... जी चाहता है की तुम्हारे इस हसीं बदन को ऐसे ही सदा निहारता रहूँ...
शैली- तुमसे इनकार किसने किया है, मैंने इस जवानी और जिंदगानी को अब तुम्हारे नाम ही लिख दिया है... आओ ... मुझे लूट लो मेरे दीपू... इससे पहले की इस रस को आवारा भँवरे चूस लें उससे पहले ही तुम इस फूलों की बगिया को लूट लो मेरी जान... आजाओ ... मेरे और करीब आओ... मुझे अपनी बांहों में कैदकर लो... जब तक मेरी हड्डियाँ न चटकने लगें तब तक मत छोडो मुझे....
दीपू- ओह शैली.... कितनी सेक्सी हो तुम, तुम्हारी आवाज में गज़ब की मादकता है... सिर्फ़ आवाज सुनकर ही मेरे रौंगटे खड़े हो गए हैं...अगर मेरा वश चले तो मैं इस गुलशन का हमेशा -हमेशा के लिए रखवाला बन जाऊं... इसमे मुझे खूब सुख मिलेगा...
शैली- हमेशा तुम्हें ऐसे ही सुख देती रहूंगी... तुम जैसे भी संतुष्ट होना चाहो , वैसे हो सकते हो... मुझे बिल्कुल भी ऐतराज नहीं होगा... बिस्तर मैं तुम्हें काल गर्ल जैसा ही आनंद दूंगी...
दीपू- बार -बार इस हब्द का इस्तेमाल मत करो डार्लिंग... ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे गाली दे रहा है...
शैली- काल गर्ल नाम शब्द से तुम्हारा पीछा कभी छोटने वाला नहीं है दीपू... अगर मुझे अपनाओगे तो जिस भी मोड़ पर जाओगे लोग तुम पर उंगलियाँ उठाएंगे... हो सकता है ताना भी देन तुमको...
दीपू- मैं ऐसे वाहियात लोगों की टिप्पणी की फ़िक्र नहीं करता... मुझे अपना प्यार चाहिए ... मैं अपनी महबूबा से सिर्फ़ प्यार ही नहीं करता बल्कि उसका सम्मान भी करता हूँ और यह हक़ मुझसे कोई नहीं छीन सकता... समाज की सदी गली कुरीतियाँ भी नहीं....
शैली- काश , ये मजबूत इरादे हमेशा बुलंद रहें और तुम्हें याद रहें... आवाज का यह अंदाज कानों में रस घोल रहा है... तुम्हारे ये शब्द मेरे लिए पुरस्कार से कम नहीं हैं... मैं मरते -मरते भी इन शब्दों को याद रखूंगी... मैं एक वैश्या हूँ, रोजाना मेरा पाला अलग-अलग लोगों से पड़ता है... जिस्म फरोसी के इस कंटीले सफर में मुझे बहुत सारे लोग मिले लेकिन उनमें से कोई ऐसा नहीं था जिसने मुझे सम्मान देने की बात की हो... धन दौलत देने वाले बहुत होते हैं , आंशिक सुख सुविधा देने वाले भी होते हैं , प्रेम का नाटक करने वाले भी कम नहीं लेकिन सच्चा प्यार और सच्चा सम्मान देने वाले नसीब से मिलते हैं...
उसकी बातों से दीपू कामुक हो चुका था... वह बेहद अश्लील बातें कर रही थी... दीपू ने उसके होठों को चूमने के बाद उसके सीने को सहलाना शुरू कर दिया... धीरे -धीरे उसके हाथों का दवाब बढ़ता जा रहा था... उसी तरीके से शैली अब दीपू के ख़ास अंग को सहलाने लगी... जब आग दोनों तरफ़ लगी हो तो तबाही होनी थी... उन दोनों के जिस्म काम वासना की भाती में सुलगने लगे ... आंखों में कामोतेजना के लाल- लाल डोरे तैरने लगे... आहिस्ता -आहिओस्ता कपड़े भी उतरने लगे... अपने कपड़े उतारने के बाद शैली ने दीपू को पूरी तरह से निर्वस्त्र कर दिया... जब दोनों नग्न होकर एक दूसरे से मिले तो अथाह सुख की प्राप्ति होने लगी... शैली ने अपनी आँखें बंद कर लीं... वह इन हसीं पलों को हमेशा के लिए अपनी आंखों में , अपने दिल में और अपनी यादों में बसाना चाहती थी... दीपू ने पूछा भी-
- क्या हुआ शैली, तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा क्या ? आँखें कर लीं...इसलिए पूछ रहा हूँ...
शैली- स्वर्ग का सुख भी इस आनंद के आगे छोटा पड़ जाएगा... मैं सुकून से इसकी अनुभूति करना चाहती हूँ....
दीपू- मुझे लग रहा है जैसे मैं आकाश में उड़ रहा हूँ...
Wednesday, June 10, 2009
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