Thursday, June 25, 2009

तड़प, भाग-७५

शैली- ये तो सेठ के लिए हुआ न , मेरे लिए कभी कुछ किया हो तो बताओ... आज तक कोई ठीक सा उपहार भी नहीं दिया... मेरे जन्मदिन पर कभी नहीं आए... बहाने तो कम हैं नहीं आपके पास... पुलिस के बड़े अफसर हो ... छोटे मोटे पुलिसवाले भी इतना रॉब झाड़ते हैं... बहाने बन्नते हैं, तुम्हारा एक इंसपेक्टर आया था मेरे पास... बहुत पाक-पाक करता था... वह तो तुम्हें भी कुछ नहीं भाव दे रहा था... बोलता था जब चाहेगा मुझे अन्दर कर देगा... मैं खूब जोर से हंसी लेकिन कुछ कहा नहीं...
अधिकारी - मुझे बताना चाहिए था न, कौन से ठाणे में हैं... ऐसी जगह पर ट्रांसफर करूँगा की नानी याद आ जायेगी... किसी केस में डालकर सस्पेंड कर डालूँगा...
शैली- जाने भी दीजिये, मुझे इन सब बातों से क्या लेना देना है, मुझे तो बस तुमसे मतलब है... अगर तुम हो तो मुझे ऐरे गेरे नत्थू खेरे से क्या मतलब ?
अधिकारी - तुम गिफ्ट के लिए ताना दे रही थीं... मैं अभी एक ज्वेलर्स को फोन लगाता हूँ , पाँच तोले का हार बनवा देता हूँ, तुम भी क्या याद करोगी...
शैली- मेरा असली गहना तो तुम हो... भूले भटके कभी कभार आ जाते हो , मन बहल जाता है... तुम सच्ची दोस्ती रखते हो इसलिए तुमसे मिलने का मन करता है...
अधिकारी - अगर ऐसी बात है तो मुझे फोन कर लिया करो ... मेरा नंबर नोट कर लो ...
शैली- हमें किसीका नंबर लिखने की आजादी भला कहाँ हैं... हाँ याद करने की कोशिश कर सकती हूँ... अगर हो गया तो ठीक वरना कोई बात ही नहीं है,,,
अधिकारी- क्या -क्या ? ये क्या कहा तुमने ? ज़रा दोबारा कहो तो ?
शैली- जो आपने सुना है, वही कहा गया है... भले ही देश आजाद हो गया हो मगर हम आजाद नहीं हैं... अभी तक गुलाम हैं... हमें अपनी मर्जी से न तो किसीसे मिलने की आजादी है और न ही फोन करने की... जानवर के साथ जो होता है , वही सलूक हमारे साथ किया जाता है.... जैसे गाँव में बैल को खाना खिलाते हैं, पानी पिलाते हैं और फ़िर खूंटे से बाँध देते हैं, जब खेत जोतने बोने की जरूरत होती है तो बैल को खूंटे से खोलकर खेत पर ले जाया जाता है... ऐसे ही हमें खाने पीने और आप जैसे लोगों का बिस्तर गर्म करने का काम दिया गया... इससे आगे न हम कुछ सोच सकते हैं न समझ सकते हैं...
अधिकारी- आज की taareekh में भी kahin ऐसा हो सकता है, यह मैं सोच भी नहीं सकता था... कोई भी यकीन नहीं करेगा इस बात पर... फ़िर तो और लोगों के साथ भी ऐसा ही होता होगा...
शैली- दुनिया में बहुत गम हैं साहब ... इन्हें सुनते बैठे तो आपका मजा ख़राब हो जाएगा... मैं अपने सारे कपड़े उतार चुकी हूँ, आप आनंद ले सकते हैं... मैं अपने सभी वीआईपी ग्राहकों की पसंद समझती हूँ, जिसको जैसे अच्छा लगता हो वैसा करने की कोशिश करती हूँ... आपकी आदत है की कपड़े उतारते ही हमला कर देते हो... दूसरे राउंड में प्यार करते हो ... इसलिए आपकी इच्छा का सम्मान किया जा रहा है, मुझे कोई जल्दबाजी नहीं है...
अधिकारी - मूड तो ख़राब हो चुका है, मजा अब ऐसे नहीं आएगा... पहले मैं इस समस्या का समाधान तो करदूं...अच्छा एक बात बताओ, तुम लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते ?
शैली- फ़िर आप जैसे बड़े पुलिस अधिकारी किस दिन काम आयेंगे, रवि जैसे बड़े बिजनेसमेन के एक इशारे पर पुलिस कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाती हैं...
अधिकारी - आह.... अब तक हमसे बहुत कुछ गलतियाँ होती रही हैं, अब आगे से नहीं होंगी...

वह पुलिस का बड़ा अधिकारी था, जब शैलोई ने उससे दिल को छूने वाली बात कही तो वह पिघल गया... उसका मन में दया के भाव आने लगे... उसे सचमुच इस बात का इल्म नहीं था की गर्म गोश्त के व्यापारी गरीब और मजबूर लड़कियों को इस तरह यातना देते होंगे... वह शैली का नग्न बदन देखकर बेकाबू होने लगा... उसकी गोलाइयों को मसलते हुए बोला-
-तुम क्या जानो, तुम्हें पाकर मैं क्तिना खुश हूँ, अब अगर मैं तुम्हें थोडा सा खुश भी नहीं कर पाऊँ तो यह नाइंसाफी होगी... आज से तुम आजाद हो... कोई तुम्हारी तरफ़ नजर उठाकर भी नहीं देख पायेगा...









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