Sunday, June 21, 2009

तड़प, भाग-70

शैली का दिल जोर जोर से धड़क रहा था... उसके दिमाग में न जाने कितनी आशंकाएं जन्म ले चुकी थीं... भले ही दीपू ने तर्क देकर उसको शांत कर दिया लेकिन दिल की गहराइयों में भी यह बात घर कर गयी की दीपू कोई साधारण हस्ती नहीं है... दीपू भी अपने मन में डर रहा था ... उसने बड़ी मुश्किल से बात संभाली थी अगर ठीक तरह से बात बनाने में माहिर नहीं होता तो गड़बड़ हो सकती थी... उसने एक बार फ़िर शैली को गर्म करना शुरू कर दिया, उसकी गोलाइयों को दबाने में उसे बहुत सुख मिलता था... उसके होठों का रस चूसने में भी वह अब तक माहिर हो चुका था... किसी ने ठीक ही कहा है की इन चीजों के स्कूल तो होते नहीं हैं, ये बातें तो ऐसी हैं की ख़ुद ही सीखी जाती हैं... दीपू होशियार था , फ़ौरन सब कुछ सीख जाता था... प्रणय क्रीडा का हर अंदाज उसे बखूबी मालूम था...शैली ने भी उसको दिल से सब गुन सिखाये थे... दोनों खामोश होकर काफी देर तक मोहब्बत का खेल खेलते रहे , जब दीपू को लगा की शैली कुछ ज्यादा ही सोच रही है तो उसने कहा-
-जब तुम प्यार करती हो बहुत अच्छी लगती हो... मुस्कराती हो तो फूल झरते हो ...
शैली- बहका रहे हो मुझे , मैंने सुना है की जब मर्द तारीफ़ करते हैं तो समझना चाहिए की वे अपनी कुछ बात मनवाना चाहते हैं... तुम्हारे पास तो सब कुछ है, जवानी है, मर्दानगी है ...और क्या चाहिए ?
दीपू- सिवाय तुम्हारे प्यार के और भला मैं क्या चाह सकता हूँ...अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए...
शैली- प्यार की बातें बहुत सुहानी लगती हैं, रूह भी खुश हो जाती है , लेकिन जब कोई ऐसा कहने के बाद दिल को तोड़ देता है तो बड़ी तकलीफ होती है... रूह तक काँप जाती है...उस तड़प को सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है...
दीपू- इंसान को हमेशा पोजिटिव ही रहना चाहिए... वरना वह अपनी आधी जिन्दगी तो ऐसे ही बरबाद कर डालता है... हमें हर पल को जीना है, अच्छी तरह से जीना है... इसके लिए हमारे आत्मविश्वाश को मजबूत होना चाहिए... मैं ज्यादा तो नहीं जानता , दोस्त लोगों से जो सुनता हूँ वही कह रहा हूँ...
शैली- कुछ कुछ समझने की कोशिश कर रही हूँ... इतने नादाँ भी नहीं लगते हो तुम...भले हो मगर ....
दीपू- शक कर रही हो मुझ पर ? एक दिन सब समझ जाओगी... चलो , अब कुछ खा पी लेते हैं...
शैली- यहाँ मन नहीं लग रहा ... अब हम दूसरे किसी होटल में चलेंगे... पुलिसवालों ने मेरा मूड ख़राब कर दिया है... तुमने एक के गाल पर थप्पड़ भी रसीद कर दिया , अब वे लोग हमसे दुश्मनी भी कर सकते हैं... हो सकता है वे अपने बड़े अधिकारियों को इसकी सूचना दे दे... अगर यह पता चला की तुम नकली अधिकारी हो तो वे लोग हमारे पीछे ही पड़ जायेंगे....
दीपू- ठीक है, अगर ऐसी बात है तो हम यहाँ से चलते हैं.... यह वही होटल है जिसकी तुम बहुत तारीफ कर रही थीं, कहती थीं की यहाँ पर किसी भी हालत में पुलिस नहीं आएगी , अब क्या हुआ ? सारी नेतागीरी फेल हो गयी...
शैली- हाँ यार, जब बुरा वक्त आता है तो ऐसा ही होता है...
दीपू- मैं एक बार और तुम्हारे हुस्न का रस चखना चाहता हूँ, कोशिशों के बावजूद मैं अपने आप पर कंट्रोल नहीं कर पा रहा हूँ, तुम्हारा यह गदराया हुआ बदन मेरी आंखों में बस गया है... अब मुझे निराश मत करना...
शैली- ये सारी जवानी तुम्हारे नाम लिख चुकी हूँ, निराश करने का सवाल ही नहीं उठता ....
दीपू- तो फ़िर मेरी बांहों में समा जाओ , मुझे अपने आप से ज़रा भी दूर मत रखो...

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