फरहा- सच कहते हो .... आह.... काश , मैं तुमसे पहले मिल पाती... काश मैं भी आपकी ही तरह इस आनंद को पहले भोग पाती... तब कितना मजा आता... मैं कितने दिनों के बाद तुमसे मिल पाई हूँ...
सलीम- कोई बात नहीं देर आए, दुरुस्त आए... अब मैं हमेशा तुमको यह सुख देता रहूँगा... यह मेरा फर्ज समझिये... अपना धर्म समझकर अब मैं आपसे मोहब्बत करता रहूँगा...
फरहा- आह... तकलीफ हो रही है... थोड़ा सा आहिस्ता कीजिये... ऐसा न हो की आज ही मेरा दम निकल जाए... अब तो मैं पूरी तरह से थक गयी हूँ... अब रहने दीजिये न प्लीज... छोड़ दीजिये...
सलीम ने उसको छोड़ा तो नहीं उलटा उसको और भी मजबूती के साथ जकड लिया... अब वह फरहा की जवानी का रस चख रहा था... तन के साथ-साथ उसका मन भी तृप्त हो रहा था... फरहा उसको जोरदार तरीके से भीचे हुए थी... उसकी दहकती हुई जवानी को सलीम के फिसलते हाथ और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहे थे... कुछ देर में ही वे दोनों एक दूसरे में समा गए, उन दोनों की प्यास शांत हो गयी... जब वे वासना को शांत कर चुके तो सलीम ने कहा-
- अब तुम जाइए , बाथरूम में फ्रेश हो जाइए... आज की प्रणय क्रीडा में जो सुख मिला है उससे तन और मन आनंदित हो गए हैं... मैं इन हसीं पलों को कभी भूल नहीं पाऊंगा...
फरहा- मेरे लिए भी इन्क्षणों का विशेष महत्त्व है... मैं इन यादों को हमेशा सँजोकर रखूंगी...तुम्हारा यह खूबसूरत चेहरा मेरे दिलो दिमाग में ऐसे बस गया है जैसे फूल में सुगंध....सितारों में रोशनी बस जाती है...
सलीम- ओह.... कविता लिखे लेती हो तुमतो... शब्दों का चयन बहुत अच्छी तरह से कर लेती हो... वाह... अब पता लोग प्यार में पागल कैसे हो जाते हैं, मेरे जैसे ही होते होंगे .... जैसे मेरे सीने में तुम ही तुम हो, आंखों एम तुम ही तुम हो, जहाँ जाऊं वहीं पर तुम ही तुम दिखाई देती हो... जब स्कूल गया तो बच्चों को पढा रहा था ...वहाँ पर ब्लेक
बोर्ड में मुझे तुम्हारी ही सूरत नजर आ रही थी...मैं बहुत मुश्किल में फंस गया हूँ...
फरहा- अगर ऐसी बात है तो मुझसे ज्यादा दीवाने नहीं हैं आप ... अपने प्यार से मिलने के लिए मैंने कितना बड़ा रिस्क लिया है, देखो अपने नाना- नानी को सोता छोड़कर बाहर से फ्लेट का टाला बंद कर आयी हूँ, अगर कुछ हो गया तो कैसा गज़ब हो जाएगा... अगर वे देखने के लिए दरवाजा खोलने लगें तो उन्हें इस रहस्य का पता चल जाएगा... तब क्या करेंगे वे ? क्या सोचेंगे मेरे बारे में....
सलीम- बेवजह तुम परेशान हो रही हो, जाइए फ्रेश होकर आइये और फ़िर एक बार नाना -नानी को देख आइये... उसके बाद आना , हम दोनों मिलकर प्यार की एक नई परिभाषा तैयार करेंगे... इस बार तो आराम-आराम से मजा लिया है... अब आगे -आगे देखिये क्या होता है... प्यार को हम नई ऊंचाइयां देंगे...
फरहा- मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ रहूंगी, अब मैं बाहर से दरवाजा खोलकर आ रही हूँ... जो भी करेंगे अब खुलकर करेंगे... खुल्लम -खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों...
सलीम- शाबाश ... अब तुम मेरी सच्ची और अच्छी प्रेमिका हो... अब मैं तुम पर आँख मूंदकर विश्वाश कर सकता हूँ... मेरे ही रंग में रंग गयी हो मेरी जान...
फरहा- तुम्हारी जुबान बहुत मीठी हो गयी है... मन में लड्डू फ़ुट रहे हैं... बहुत सुख की बेला है, इस बेला को मैं बेकार नहीं जाने दे सकती... आज मुझे बांहों में लेकर कसम खाओ की मेरे साथ कभी दगा नहीं करोगे ...
सलीम अपनी जान की सौगंध खाता हूँ... अब तो तसल्ली हुई...
फरहा- तसल्ली तो पहले से ही थी , अब और यकीन हो गया है.... मैं अभी आती हूँ फ्रेश होकर ...
सलीम सोच में पड़ गया... जब शरीर का जोश ठंडा पडा तो याद आया की उसने कितनी बड़ी हद पार करदी थी... अब इस रिश्ते को नहीं निभाने का मतलब था का अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मारना ...
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