फरहा मन ही मन खुश थी, उसको सोने की एक अंगूठी मिल चुकी थी और हार का वादा भी... उसने निश्चय कर लिया की पाँच तोले से कम का हार पसंद नहीं करेगी... उसको सलीम के रूप में एक ऐसा चेक मिला था जिसे वह कभी भी भुना सकती थी... उसने तो यहाँ तक सोच लिया की अपने घर का राशन भी वह सलीम से ही भरवाएगी...सलीम को भी इन सबसे कोई ऐतराज नहीं था... वह सोच रहा था की अगर वह रोजाना बार की लड़की के साथ रात गुजारेगा तो उसको रोजाना डेढ़ से दो हजार का खर्च आएगा जबकि हर महीने दो पाँच हजार खर्च करके वह आराम से फरहा की जवानी का प्रतिदिन स्वाद चख सकता था... उन दोनों के अपने -अपने hit थे... वे दोनों एक दूसरे से स्वार्थ से ही जुड़े थे मगर दिखा ऐसे रहे थे मानो वे सबसे भले और निस्वार्थ प्रेमी- प्रेमिका हैं... फरहा की साँसे खूब जोर से दाहक रही थीं... वह धीरे से बोली-
- आह... अब मैं अपने अन्दर टूट -मुझे ऐसे मत तरसाइए.... इससे अच्छा तो जान ले लीजिये मेरी...
सलीम- ओह.... यह जो आग लगी है इसने मुझे भी तो झुलसा दिया है... मेरी हालत का अनुमान तुम नहीं लगा सकतीं, मगर मैं क्या करुँ मजबूर हूँ... अपने वाडे से बंधा हुआ हूँ... जब तक मैं तुम्हारे साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाऊंगा तब तक की तुम ख़ुद इजाजत नहीं देतीं...
फरहा- मैं बार- बार अपने फैसले नहीं बदला करती... एक बार जो कह दिया सो कह दिया... अब फैसला आपके हाथ में हैं... आप जो फैसला करें उसमे यह भी देखलें की मेरी ख्वाहिशों का गला भी नहीं घोंटते...
सलीम- इस इम्तिहान से बेहतर होता की मेरे प्राण निकल जाते... मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता... तुम बहुत सुंदर हो फरहा... अगर मैं इस अग्निपरीक्षा से पास हो गया तो फ़िर जीवन में कभी फेल नहीं हो सकता....
Sunday, August 2, 2009
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