Tuesday, August 18, 2009

दिलफेंक पडोसन , भाग-26

उसके फरहा चली गयी, जाने से पहले उसने जी भरके प्यार का इजहार किया... सलीम अपने आपको दुनिया का सबसे किस्मतवाला इंसान समझ रहा था... उसकी रग-रग में फरहा बस चुकी थी...वह उसके प्यार में इतना पागल हो गया की उसने अपना हर पल फरहा के नाम करने की ठान ली... फरहा की बातों ने भी उसका दिल जीत लिया था, उसकी खुशी की खातिर तो वह अपने आपको रखैल भी बनने को तैयार थी, ऐसी त्याग की मूर्ती महबूबा आज के जमाने में भला कहाँ मिलती है ? वह इन्हीं ख्यालों में खोकर सो गया... सुबह उसके जागने से पहले ही फरहा नाश्ता लेकर मौजूद थी... सलीम मुंबई में अकेला ही रहा था, इस कारण उसको हर काम ख़ुद ही करना पड़ता था... फरहा की सेवा से वह निहाल हो गया... उसके जीवन में पत्नी की जो खाली जगह थी उसको फरहा के प्यार ने भर दिया था... अब वह हर समय उसीके ख्यालों में खोया रहता था... उसके सूने जीवन में अचानक बहारें आ गयीं थीं.... जब वह अपने स्कूल के साथी टीचर्स के साथ बात करता तो सब लोग उसकी खुशी का राज पूछते थे...वह क्या कहता बस हंसी में ताल जाया करता था... लेकिन इश्क और कभी छिपाए नहीं छिपते... लोगों को ख़बर मिल ही जाती है... उसकी पूरी सोसाइटी में हंगामा मच चुका था... कुछ मनचले किस्म के लोग अपना हाथ मलते रह गए तो कीया ऐसे भी थे जिन्होंने अभी तक उम्मीद का दामन नहीं छोडा था... इसी सोसाइटी में एक बार में काम करने वाला मेनेजर भी रहता था , वह सोचता था की अगर फरहा बार में डांसर का काम करने लगे तो खूब कमाएगी...वह इसी बहाने उसके उत्तेजक उभारों को मसलने का, उसके साथ हमबिस्तर होने का खवाब देख रहा था... मगर फरहा तो किसी और ही मिट्टी की बनी थी... वह नदी की धारा की तरह प्रवाहित होने में विश्वाश करती थी... उसको ठहरा हुआ पानी अच्छा नहीं लगता था... एक और सज्जन थे , जो सलीम से अपनी तुलना करते थे... उनका मलाल ये था की सलीम से शक्ल -अक्ल , ओहदा और यहाँ तक की पैसे में भी अव्वल होने के बावजूद फरहा ने उनको तवज्जो नहीं दी,, अब सलीम की किस्मत से जलने के अलावा कोई चारा भी नहीं था... अपनी किस्मत कोसते थे और इस जोड़ी को हूर के साथ लंगूर की जोड़ी कहते थे... सलीम और फरहा को दुनिअदारी से कोई मतलब नहीं था... वह इतनी ज्यादा खूबसूरत थी की दूर-दूर के लड़के भी उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे, कुछ लोग तो उसके घर पर उसके नाना -नानी से मिलने , उनका हाल चाल पूछने सिर्फ़ इसीलिए आने लगे थे क्योंकि वहाँ आने पर उन्हें फरहा के दीदार अच्छी तरह से हो सकते थे... फरहा भी भी इस स्थिति का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना नहीं भूलती थी... एक फल का व्यापारी जब उसके घर के चक्कर लगाने लगा तो ग्फर्हा ने उसको रोजाना दो किलो सेब लगाने का अदद काम सौंप दिया... यह गिफ्ट लाकर भी वह व्यापारी बड़ा खुश रहता था...एक था सब्जी बेचने वाले का लड़का... उसीकी उम्र का था.... वह जब दूर के किसी रिश्ते का हवाला देकर फरहा के घर आने लगा तो उसको भी रोजाना ताजा -ताजा सब्जी लाने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी... उसका एक ही सिद्धांत था- जो जितना पैसा खर्च करेगा वह उसके उतने ही समीप आएगी... यही वजह थी की सलीम के अलावा सबको निराशा ही मिली थी, हांलाकि बाहर के इलाकों में यह हाल नहीं था... जब भी उसका जी चाहता वह तभी रंगरेलियां मनाने के लिए अपने दोस्तों के साथ दूर निकल जाती थी... सलीम को यह पसंद नहीं था की वह और लोगों से मिले जुले लेकिन फरहा तो खुले आसमान में उड़ने वाले पक्षी की तरह थी, उसने पहले भी अपनी ये आदतें सलीम को बतादें थीं... मगर दिल तो आख़िर दिल होता है, सलीम उसको जीजान से चाहने लगा था... वह चाहता था की हर फूल पर मंडराने वाली तितली उसके घर में परदे में रहे , वह सिर्फ़ उसीको चाहे , उसीको सराहे ... ऐसा कहीं होता है क्या? क्या फूल अपनी सुगंध त्याग सकता है ?क्या चंदन अपनी शीतलता छोड़ सकता है क्या ? कभी नहीं... जिसका जो स्वभाव है वह उसे हरगिज नहीं बदल सकता... फ़िर फरहा भला कैसे कुछ बदल सकती थी ... एक दिन सलीम ने अपने मन की बात फरहा से कहदी-
- मैं तुमसे बहुत मोहब्बत करता हूँ, अब ये नहीं चाहता की कोई दूसरा तुम्हें देख भी पाये... बस अपने दिल में बसाकर रखना चाहता हूँ... मैं चाहता हूँ की हवा भी तुम्हें स्पर्श न कर पाये, जब लोग तुमसे मिलते जुलते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता ...दिल को बड़ी ठेस सी लगती है...
फरहा- यह प्यार नहीं वहम होता है सरकार... प्यार में तो इंसान किसी भी हद से गुजर सकता है... मेरा स्वभाव ही ऐसा है की मैं घर में कैदी की तरह नहीं रह सकती... कभी नहीं....ये बात तुम्हें मैं पहले भी बता चुकी हूँ...

No comments: