Monday, August 31, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-38

मगर अब क्या हो सकता था जब चिडिया चुग गयी खेत ? वह फरहा के ऊपर बहुत दौलत खर्च कर चुका था... हांलाकि तनख्वाह के अलावा भी वह अच्छा खासा कमा लेता था मगर फरहा पर वह बहुत पैसे खर्च कर चुका था... सलीम अब राजू को लेकर उसी बार में पहुच गया था , उसने उस लड़की की बुकिंग भी करवा दी... इसके लिए स्पेशल लोग भी बुक कर दिया गया... सलीम ने एक बात अपने डॉट राजू से भी छिपाई , उसने बुक किए कमरे में एक ऑटोमैटिक और छिपा हुआ कैमरा लगा दिया था, ताकि वह अन्दर की गतिविधियों को हूबहू देख सके, उस कैमरे को उसने अपने बाजू वाले कमरे में , लैपटॉप से जोड़ दिया... मगर अफ़सोस , उनकी सारी मेहनत पर पानी फ़िर गया, जब लड़की को साथ ले जाने का वक्त आया तो उसे बताया गया की उस मोडल की तबियत ख़राब है... राजू को अपने तर्क पर भरोसा हुआ ...उसने कहा भी-
- कहो सलीम... मैंने कहा था ना , ये लोग उल्लू बना रहे हैं... नामचीन लोगों या खूबसूरत लोगों के फोटो दिखाकर ये पैसे पागल लोग दो प्यार करने वालों के दिलों में नफरत घोल देते हैं....
सलीम- हाँ यार... अब तो कहते हैं की दूसरी लड़की पसंद कर लो... एक से बढ़कर एक लड़की है... काहलो छोडो अब घर चलते हैं... आज पीने का मूड भी नहीं हो रहा... ऐसी टेंशन में कैसे कुछ अच्छा लगेगा ?
राजू- ठीक है, मेरी मानो तो घर जाओ और फरहा के साथ खूब जी भरके मस्ती करो... वरना शक के चक्कर में आनंद से भी हाथ धू बैठोगे... समझ रहे हो....
सलीम- तेरी बात सही है... कल देखते हैं, क्या करना है ? फिलहाल यहांसे चलना ही ठीक है...
राजू अपने घर चला गया और थके हारे क़दमों से सलीम भी घर आ गया... उसे फरहा फ्लेट के सामने ही मिली... उन दोनों की निगाहें मिलीं तो फरहा शरारत से मुस्क्रादी , मन में अनेकों अभिलाषाएं थीं, जो उसके चेहरे से पढ़ी जा सकतीं , गिले शिकवे थे जिन्हें आंखों से देखा जा सकता था... वह आराम से घर के अन्दर घुस गया... फरहा उसके पीछे -पीछे थी... वह पानी लेकर आयी, सलीम ने पानी पिया तो वह उसके जूते के फीते खोलने लगी, फरहा के इस अपनत्व भरे व्यवहार से सलीम के मन से सारी कड़वाहट घुल गयी, उसने उसे गले से लगा लिया... फरहा ने दरवाजा बंद कर दिया , पूछने लगी-
- आजकल खोये -खोये से लगते हो, क्या बात है ... कोई परेशानी हो तो बताओ हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं... सूना है की अपनों से अपना गम कह देने से वह हल्का हो जाता है...
सलीम- कुछ ख़ास नहीं यार, बात इतनी सी है की कुछ लोगों पर मेरे पैसे बकाया थे अब मुझे जरूरत पडी है तो कोई भी देने को तैयार नहीं है, बहुत परेशानी हो रही है... सामने वाले को पेमेंट देनी है...
फरहा- तो इसमें कौनसी बड़ी बात है... उन लोगों से प्यार से बात करो , अगर नहीं मानते हैं तो कानूनी नोटिस दिलवाओ... फ़िर देखो वे कैसे आगे -आगे पैसे देते हैं...
सलीम- लेकिन कानूनी नोटिस सम्भव नहीं है, अपने को पैसे भी निकालने हैं और उनसे आगे के लिए काम भी लेना है , वे लोग बे ईमान नहीं हैं.... बस टाइम पर अपना पैसा नहीं मिल पा रहा है...
फरहा- तो थोडा सा सब्र करो , सब्र का फल हमेशा मीठा होता है... जिनका पेमेंट करना है कर दीजिये मैं किसी से उधार मांगकर दे देती हूँ... अपने पापा से मांग लुंगी... टेंशन की कोई बात नहीं है...
सलीम - नहीं यार , मैं तुम्हें कोई तकलीफ नहीं देना चाहता... इसीलिए तो तुम्हें बता नहीं रहा था...
फरहा- मुझे क्या इतना गैर समझते हो, मुसीबत के समय अपने ही तो काम आते हैं... बल्कि अपने और पराये की पहचान मुसीबत के दौरान ही होती है...
सलीम ने फरहा को अपनी बांहों में भर लिया और उसके रसीले होठों को चूमने लगा... फरहा के जिस्म में सनसनी सी दौड़ने लगी... वह गर्म आह भरने लगी ... सलीम कह रहा था-
- जब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ तो कोई गम नहीं होता, कोई फ़िक्र नहीं होती, कोई थकान नहीं होती... तुम्हारे प्यार में सब कुछ भूल जाता हूँ...
फरहा- तब भी मुझे छोड़कर न जाने कहाँ -कहाँ भटकते रहते हो,
सलीम- जाना कौन कमबख्त चाहता है मगर क्या करें उलझनें ही इतनी हैं की निकलना ही पड़ता है...

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