सलीम- नेकी और पूछ-पूछ ,जल्दी से कहो मैं तो उतावला हो रहा हूँ... बहुत देर से तो मैं ही बक-बक कर रहा था ... अब तुम कुछ कहने की इच्छा जताई है तो फ़टाफ़ट कहो मेरी जान... तुम्हारे शब्द मेरे कानों में रस सा घोलते हैं॥
फरहा- एक बार मैंने एक लड़के को एक बकरी से लिपटते हुए देखा था... यह दो साल पहले की बात है... बकरी जब जोर -जोर से चिल्लाने लगी तो उसने उसका मुह बंद कर लिया... मैं हैरत में थी...
सलीम- कहाँ का किस्सा है ये ? तुम कहाँ थीं उस वक्त ?
फरहा- मैं गाँव गयी थी, गरमी का समय था... मैं अपनी एक सहेली के साथ घर से दूर खेतों की तरफ़ जा रही थी... मेरी सहेली कह रही थी की वहां पेड़ की छाया मिलेगी , हवा भी चल रही होगी इसलिए गरमी से छुटकारा मिल जाएगा...मैं उसके साथ चलदी...मौसम बहुत गर्म था और लू चल रही थीं... जब हम खेतों पर पहुचे वहां एक हेंडपंप पर रुके , मेरी सहेली राजो थी, वह हेंडपंप चलने लगी मैं पीने लगी... बहुत प्यास लगी थी , होठों से हवा ऐसे टकरा रही थी जैसे जंग के दौरान सीने से गोलियाँ आर-पार निकलती हैं...
सलीम- अच्छा... फ़िर क्या हुआ ? क्या वह महाशय वहीं पर मौजूद था ?
फरहा- हाँ यार, मेरी निगाह सामने वाली झौपडी पर गयी... उसमे दरवाजा नहीं था... वहाँ से एक बकरी के चिल्लाने की आवाज आ रही थी... मैंने उत्सुकता वश उस तरफ़ देख लिया... फ़िर तो समझो गज़ब हो गया... एक लड़का बकरी को अपने कब्जे में कर उस पर हावी हो रहा था, वह पसीने से तरबतर था, बकरी खूब शोर मचाने लगी तो उसने उसके मुख पर अपनी हथेली रखदी... मैंने राजो से उस तरफ देखने को कहा... हम दोनों इस द्रश्य को देखकर उत्तेजक हो रही थीं... राजो ने मैंने सीने पर चिकोटी काटली , यह पहला स्पर्श था...
सलीम- आह...तब तो खूब मजा आया होगा... मैं होता तो और भी आनंद आता ... मैं रह गया उस सुख से...
फरहा- हाँ तब तो जिस सुहागरात का आनंद हम यहाँ उठा रहे हैं , वह बहुत पहले ही जंगल में मना ली गयी होती... उस दिन मैंने पहली बार किसी मर्द को एक जानवर के साथ सम्बन्ध बनते हुए देखा था...
सलीम- हाँ यार यह तो बहुत डेंजर बात है, हैरत वाली बात है... मैंने ऐसा कभी सोचा भी नहीं था...
फरहा- हाँ ,,, और उस समय एक स्थिति ऐसी भी आयी की बकरी गिर पडी लेकिन उसने बकरी तो तभी छोड़ा जब वह संतुष्ट हो गया... इसके बाद उसने अपना निचला वस्त्र पहना और लाठी लेकर चला गया... मैं उसका चेहरा ठीक से नहीं देख पायी थी... जब वह निकला तो हम दोनों एक पेड़ के पीछे छिप गए थे , इसलिए उसकी नजर हम पर नहीं पडी... जब वह चला गया तो मैंने रजो से कहा-
-यह बकरी के साथ क्या कर रहा था ? बहुत चिल्ला रही थी बेचारी ...दुःख हो रहा होगा ना ?
राजो- हाँ, दुःख तो होगा ही... कहाँ वह इतना मजबूत लड़का और कहाँ यह बकरी ? तू तो ऐसे पूछ रही है जैसे तू कुछ जानती ही ना हो... यह वाही कर रहा था जो लड़की रात को लड़की के साथ करता है...
फरहा- मैं क्या जानूं री... मैं क्या रोज देखती हूँ ? आज न जाने कैसे यह सीन देखने को मिल गया...
राजो- हम तो अक्सर देखते रहते हैं... कितनी ही ऐसी लड़किया हैं जो अपने यार के साथ जंगल में मंगल मनाने के लिए आती हैं...जो ज्यादा सती सावित्री बनतीं हैं उन्हीं के रंग ज्यादा दीखते हैं...
फरहा- ठीक कहती हो, मगर मुझे तो बहुत डर लगता है, किसी लड़के से बात भी करने की इच्छा नहीं होती... कुछ हो गया तो ? लेने के देने पड़जायेंगे , बदनामी होगी वह अलग...
राजो- बात में दम है... मगर मन का क्या करोगी, इस सीन को देखकर मेरे बदन में आग लगी हुई है... देखो ना यह सीना कितना धक्-धक् कर रहा है... सच कहती हूँ अगर मेरा वश चले तो तुझसे लिपट जाऊं...इससे क्या होगा की एक तो कुछ होने का डर नहीं और किसी तरह की कोई बदनामी भी नहीं...
फरहा- तो सहेली है मेरी... तुझे लिपटने से किसने रोका है, आ ना तेरे मन में जो भी हसरत पल रही हैंउन्हें पूरी तरह से निकाल ले... हो सकता है मेरे तरसते मन को भी इससे कुछ तसल्ली मिल जाए...
राजो- कुछ की बात करती है, इससे तो खुश हो जायेगी, तेरा गाँव में दिल नहीं लग रहा ना, फ़िर तो तू शहर में जाने का नाम भी नहीं लेगी... तुझे इतना मजा आ जायेगा...
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