Sunday, August 9, 2009

दिलफेंक पडोसन,17

सालों को लगता था की उसने पहले ही दिन अपना कम कर दिया है, यानी की वह मोर्चा मार चुका है , जबकि फरहा को लगता था जैसे की वह अपनी जंग पहले ही दिन जीत चुकी है... यह एक ऐसी जंग चल रही थी जिसमे दोनों ही अपने आपको जीता हुआ महसूस कर रहे थे... सच्चाई यह थी की उन दोनों ही हार चुके थे... सलीम दौलत हार रहा था और फरहा अपना चरित्रजब सलीम आ गया तो फरहा ख़ुद उसे ऊपर तक लेकर गयी... इस द्रश्य को सोसाइटी के कई सदस्यों ने अपनी आंखों से देखा, कुछ ने खुसर फुसर भी की मगर फ़िर सब अपने-अपने कामों में जुट गए... वैसे भी मुंबई में किसीके पास फालतू बातों के लिए वक्त ही कहाँ है... दूसरे के फटे में टांग डालने के बजाय सब लोग अपनी- अपनी फटी सीने में लग जाते हैं.... सलीम से चाबी लेकर उसने ख़ुद दरवाजा खोला और अपने घर चाय बनाने चली गयी... वह बेहद खुश थी... उसे खुश देखकर उसकी नानी भी खुश हुयी ... बोली-

- बहुत खुश हो फरहा ? क्या बात है , कहीं कारूं का खजाना मिल गया है क्या ? पहले तो कहती थीं की यहाँ नहीं आउंगी, और अब देखो... पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं... हम भी तो जानें की आख़िर बात क्या है ?

- आप भी कमाल करती हैं नानी... अगर मैउन चुप होती हूँ तो आफत खादी हो जाती है और खुश रहती हूँ तो टोकाटाकी शुरू हो जाती है... फ़िर आप लोग ही तय करें की मुझे करना क्या है ? जब हसने कहोगी , हसूंगी और रोने कहोगे तो रो लुंगी... तब तो सब कुछ शांत हो जाएगा न ?

नानी - क्या कहती हो बेटी... रोएँ तुम्हारे दुश्मन... मुझे तो तुम तभी अच्छी लगती हो जब तितलियों की तरह घूमती फिरती हो... धमाल मचाती फिरती हो... तुम्हारे होठों को खामोशी नही सुहाती... लेकिन इस जमाने से डर लगता है... आजकल के मर्द बड़े सयाने होते हैं... बहला-फुसलाकर अपना काम निकाल लेते हैं और फ़िर दूध में से मक्खी की तरह निकालकर फेंक देते हैं... इस तरह के लड़कों से बचना...

फरहा- मैं अब बच्ची नही हूँ नानी... बुरा भला सब समझती हूँ, तुम फ़िक्र मत करो... मुझे कोई चीट नहीं कर सकता... मैं कोई अबला, अनपढ़ या गाँव की गंवार नहीं हूँ जो की कोई मुझे ब्लेक कर सकता है, या यूज कर सकता है... मैं ख़ुद ऐसे लोगों को सबक सिखाने में सक्षम हूँ...

नानी- हाँ, बेटी... यह तो अच्छी बात है... मगर इस ज़माने की क्या कहें... यहाँ अगर एक बार किसी लड़की के दामन पर दाग लग गया तो वह जीवन भर नहीं धुल पाटा...

फरहा- ये सब पुरानी बातें हैं , तुम किसीकी बात मत सुनना ... मैं हूँ बात करने के लिए... कोई कुछ बोलकर तो देखे... किसीकी हिम्मत नहीं है... मैं चलती हूँ... चाय तैयार हो गयी है, लीजिये पहले आप और नानाजी पियेंगे फ़िर पिलाकर आऊंगी उस टीचर को... थका हारा आया है... मैं चली... अपनी दवा ले लेना...

थर्मस में चाय लेकर जब फरहा सलीम के घर पहुची तो वह हाथ मुह धोकर सेंत लगा रहा था... आज वह पहले के मुकाबले ज्यादा खुश था... उसने सभी खिड़कियाँ पहले से ही बंद कर राखी थीं... अब फरहा गेट भी बंद करके आ चुकी थी सो जैसे ही फरहा उसके पास पहुची, सलीम ने उसको अपनी बांहों में भरकर चूम लिया... फरहा छटपटाने लगी... सलीम उसके होठों का रसपान करने लगा... मन में क्लाम्क्रीदा के भाव जाग्रत होने लगे... उसने फरहा के गले को कई बार चूमा, उसने सोने का हार जो पहन रखा था... सलीम ने उस उंगली को भी चूम लिया जिसमे उसने सोने की अंगूठी पहनाई थी... फरहा भी उस पर खूब प्यार न्यौछावर करने लगी ... वह इतना अपनापन दिखाने की कोशिश कर रही थी जैसे की वह उसकी पत्नी नहीं प्रेमिका हो... सलीम भी उससे खूब प्यार कर रहा था... उसको निर्वार्स्त्र करके उसके सीने को मसल रहा था... ऐसा करने से फरहा बेचैन हो रही थी... उसने बेताब होकर कहा-

-ऐसा मत करिए , पहले चाय पीलिजिये... मैं बेचैन हो जाउंगी, ऐसा ना हो की कुछ गड़बड़ हो जाए,,,,

सलीम- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मेरा पास तुम्हारे अधरों का बेशुमार अमृत मौजूद है और तुम चाय पीने को कहती हो, मैं तो एक क्षण के लिए भी तुमसे अलग नहीं हो पाऊंगा... अब मुझे अपनी सीने में बसा लीजिये... देखिये फ़िर किसी भी रास्ते से निकल नहीं पाऊँ...मैं तुमको धड़कन बनाकर अपने दिल में बंद कर चुका हूँ...

फरहा- आज मेरी नानी कुछ अजीब सी बातें कर रही थी, मुझे लगता है उनको हमारे बारे में कुछ डाउट हो चुका है, जब मेरी नानी होकर वो मेरे पे शक कर सकती हैं तो सोसाइटी के और लोग क्यों नहीं करंगे, ऐसा ना हो की हम लोग बदनाम हो जाएँ...

सलीम- तुम घबराती क्यों हो... मैं हूँ ना तुम्हारे साथ... हम लोग पहले ही सबसे अपना कोई रिश्ता बता देते हैं जैसे भाई की साली या फ़िर ऐसा ही कोई दूसरा रिश्ता... इससे सब जान जायंगे की रिश्तेदारी वाली बात है...

फरहा- मगर मेरे नानी- नाना... वे क्या कहेंगे... जब कोई उनसे पूछेगा तो वे नहीं बता पायेंगे...शक करेंगे वे अलग से... इससे अच्छा तो यही है की हम दूर का कोई रिश्ता बता देंगे... और कोई कहेगा क्या ? इस सोसाइटी में ऐसा कौन सा चरित्रवान बैठा है जिसने कभी किसीके साथ सम्बन्ध नहीं बनाया हो... अरे सबकी औकात जानता हूँ मैं... वह तीसरे माले पर जो पूजा हवं कराने वाले पंडित जी रहते है न, एक दिन मैंने उनको और उनकी नौकरानी को एक ही बेड पर बिल्कुल नग्न अवस्था में देख लिया था... वे सेक्स करने में मशगूल थे... उन्होंने जल्दबाजी इतनी की थी की दरवाजा लगाना ही भूल गए थे... इत्तेफाक से जब मैं दरवाजा खोलकर अन्दर घुसा तो खुसर -फुसर की आवाज सुनी, मैं बैडरूम में गया तो दोनों लगे पड़े थे... वे पूरे जोश में थे और उनकी साँसे जोर -जोर से चल रही थीं... काम क्रीडा में वे इतने मगन थे की मेरे कदमो की आहात भी नहीं सुन पाये... जब मुझे सामने खड़े देखा तो दोनों शर्मिंदा होने के बजाय मुझे भी उस क्रीडा में शामिल होने का आमंत्रण देने लगे, नौकरानी ने तो मुझे अपनी बांहों में भीचकर बेड पर ही गिरा दिया था और वह पंडित जी दौकर दरवाजा बंद करने चले गए थे...

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