फरहा- इसको बंद कर दीजिये , मैं इसको बर्दाश्त नहीं कर पाउंगी... मेरे अरमान मचलने लगे हैं... मन में बहुत खलबली मची है... ऐसा लगता है जैसे की किसीने जिस्म के अन्दर बारूद भरदी हो... मुझे इस रोग से बचाओ...
सलीम- क्या कह रही हो मेरी जान... कितना मनमोहक मंजर है... देखो इस सेक्सी महिला को... कैसा आनंद मिल रहा होगा... इसके चेहरे की तरफ़ तो देखो, कितनी सुखी दिख रही है... इसके दिल में तमाम खुशियाँ देखी जा सकती हैं... कुत्ता भी प्रशिक्षित दिख रहा है... यह भी खूब मजे लेलेकर सहयोग कर रहा है...
फरहा- लेकिन परेशान तो मैं हो रही हूँ... मेरे दिल की धड़कन कितनी बढ़ गयी है, यह देखिये न मैं कितनी बेचैन हूँ... मेरी बेताबी तुम इसीसे समझ सकती हो की मैं ठीक ढंग से बोल भी नहीं पा रही हूँ...
सलीम- अब तुम्क्पो बोलना भी है और इसी स्टायल से सुख भी भोगना है... धीरे -धीरे मैं तुम्हें सब कुछ सिखा दूंगा, मजा कैसे लिया जाता है इसकी पूरी जानकारी मेरे पास है... मैंने पहली वाली बीबी से सब कुछ सीख लिया है...
फरहा- क्या तुम अपनी वाइफ से भी इतना ही सुख पाते थे ?
सलीम- जितना सुख तुम देते हो, इतना वह कभी नहीं दे पाई... वह बहुत मोटी और झगडालू महिला है, उसके साथ जिस्मानी सुख पाने के लिए विशेष प्रयास करने पड़ते हैं... वह ज़रा भी सुंदर नहीं दिखती... तुम्हारे तो वह पैरों की धूल भी नहीं है... फ़िर भी मैं उसे झेल रहा था...
फरहा- क्यों ? क्या निकाह से पहले उसे देखकर नहीं आए थे ?
सलीम- नहीं हमारे गाँव में ऐसा चलन नहीं है... किसी रिश्तेदार से ही निकाह होता है... कभी -कभी तो लड़की -लड़का पहले ही देख लेते हैं और कभी नहीं भी देख पाते... यह मेरे मामा की लड़की है... मगर मैं इसे पहले कभी भी नहीं देख पाया था... निकाह के बाद गाँव बहुत कम ही जा पाया और अब जबकितुम आ गयी हो तो जाने की कभी इच्छा ही नहीं होगी...
फरहा- अगर तुम उसे पसंद नहीं करते तो फ़िर दो बच्चे कैसे हो गए ? क्या तब कुछ नहीं सोचा ?
सलीम- बच्चे क्या हैं, वो तो हो जाते हैं... शादी तो एक सामाजिक लायसेंस की तरह होता है... मैं मुंबई में हूँ और वह गाँव में हैं मुझे नहीं लगता की वहाँ वह सिर्फ़ मेरी यादों के सहारे ही जीवन बिता रही होगी...
फरहा- क्या कह रहे हो ? क्या ऐसा भी हो सकता है ? क्या वह कर सकती है ऐसा ?
सलीम- हाँ, हाँ क्यों नहीं जब मैं उसके साथ बेवफाई कर सकता हूँ तो उससे वफ़ा की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? मैं आँखें बंद करके चलने वाला नहीं हूँ, बलिक सब कुछ टोल-मोलकर ही करता हूँ... मैं ऐसा स्वार्थी भी नहीं की सिर्फ़ सामने वाले पर ही आरोप लगाऊँ, अगर मेरी भी गलती हुई तो मैं उसको स्वीकार करता हूँ....
फरहा- तो क्या तुम्हें अपनी पत्नी पर भी संदेह है ?
सलीम- शादी जब तक नही होती तब तक अलग बात है लेकिन उसके बाद किसी महिला का बिना मर्द के एकसाल अकेले रहना मुमकिन नहीं है... खासकर मेरी जैसी पत्नी का... मेरे बिना भी वह रह रही है , इसका मतलब होता है की उसने कोई विकल्प ढूंढ लिया है...
फरहा- जो तुम कह रहे हो, इससे तो महिलाए नाराज हो सकती हैं... आप महिलाओं पर आरोप लगा रहे हैं...
सलीम- जी नहीं, सिर्फ़ एक सदस्य के बारे में अपनी राय जाहिर कर रहा हूँ...
फरहा- लेकिन वह सदस्य महिला है और आपकी पत्नी भी है...
सलीम- जी... तो आप उसे सिर्फ़ महिला कैसे कह सकती हैं, और उससे पूरे महिला समाज को कैसे जोड़ सकती हैं?
फरहा- तर्क में तो आपसे कोई नहीं जीत सकता...
सलीम- और तुमसे मोहबात में ... इस प्रणय क्रीडा की तुम सबसे हसीं खिलाडी हो...
फरहा- ठीक है मेरी जान... मैं अब तुम्हें एक ऐसी बात बताउंगी जिसे सुनकर तुम हैरत में हो जाओगे...
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