Friday, August 7, 2009

दिलफेंक पडोसन , भाग-16

इन द्रश्यों को
देखकर फरहा और सलीम खूब उत्तेजित होने लगे थे... उनके मन में भी यह भावना उठने लगी थी किस तरह से वह उन फिल्मी पात्रों की तरह शारीरिक सम्बन्ध बना पाते हैं... फ़िल्म और भी ज्यादा भड़काऊ होती जा रहा थी... सलीम ने जोश में आकर फरहा को अपनी कैद में जकड लिया... यह माहोल बेहद रंगीन था... इन रंगीनियों में वे दोनों अपना एक अलग ही जहाँ बनाने के लिए बेताब थे... सलीम ने फरहा के नाजुक होठों का रसपान करना शुरू कर दिया... अब वे दोनों मोहब्बत की आख़िरी मंजिल पर जाने के लिए बेताब हो गए... उस रात सलीम ने फरहा की जवानी का जमकर आनंद लूटा... फरहा भी खुश थी, उसको सोने की अंगूठी तो मिल ही चुकी थी और सोने के हार का वादा भी मिल गया... इससे ज्यादा वह और क्या सोच सकती थी... वह सुबह होने से पहले ही वह अपने कमरे में चली गयी... सुबह होने पर उसने नित्यकर्म के बाद अपने फ्लेट में ही नाश्ता बनाने के बाद नाना- नानी को खिलाया और फ़िर सलीम को भी नाश्ता कराया... वह ऐसा माहोल तैयार करने में लगी थी जिससे की सलीम को अपनापन का एहसास हो... जब वह ड्यूटी पर चला गया तो फरहा ज्वेलर्स की दूकान पर गयी और उसे पाँच तोले के हार का ऑर्डर दे दिया... सलीम ने तो उसको पहले ही फोन कर दिया था... दूकान वाला उसकी पहचान का था इसलिए फ़ौरन हार दे दिया, फरहा ने भी झंझट से बचने के लिए ऐसे हार का चयन किया जो पहले से ही रेडी था... वह खुश थी... उसने सलीम को भी फोन करके बता दिया की घर में राशन नहीं है... सलीम ने उसको आश्वाशन दिया की हर महीने उसके घर का राशन वह ख़ुद भरवा दिया करेगा... अपने मोबाइल के पेंडिंग बिल का जिक्र भी उसने सलीम से कर दिया... सलीम ने हमेशा के लिए उसके मोबाइल बिल भरने की जिम्मेदारी स्वीकारते हुए कहा-
- अब तुम्हारी सारी परेशानियां मेरी हैं, सारे दुःख मेरे हैं और मेरे सारे सुख तुम्हारे हैं... तुम्हारे टीवी केबल का बिल , कपडा धोने का बिल, नौकरानी की पगार , लाईट बिल, मोबाइल बिल अब ये सब मेरी जिम्मेदारियां हैं... तुम सिर्फ़ ऐश करो... मैं चाहता हूँ की तुम्हें कोई टेंशन नहीं होने पाये, तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है...
फरहा- थेंक यू सलीम, तुम कितने अच्छे हो ... अब मैं बहुत जल्द अपनी मंजिल हासिल कर लुंगी... जल्दी आओ न मुझे तुम्हारी याद सता रही है, यह बहुत सुंदर हार है... मैं इसे पहनकर तुम्हें दिखाना चाहती हूँ...
सलीम- फ़िक्र मत करो मैं जल्दी ही आ जाऊँगा... वैसे भी मनपा स्कूल में सब चलता है... मैं आता हूँ, मैं ख़ुद यह देखने के लिए बेचैन हो रहा हूँ... और सुनो... किसी की नजर ना लगे इसके लिए अपनी नानी से कहकर नजर का टीका लगवा लेना... वैसे बची-खुची नजर मैं रात को आकर उतार दूंगा...
फरहा- तुम बड़े वो हो... फोन पर भी ऐसी शरारती बातें करते हो... चलो अब रखती हूँ फोन... मुझे तुम्हारे लिए सजना सवारना भी तो है...
सलीम- तुम जैसी हो वैसी ही बेहद खूबसूरत लगती हो... हूर परी भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं है मेरी जान...
फरहा- बात बनाना तो कोई तुमसे सीखे... जब कहते हो तो ऐसे कहते हो की झूठी तारीफ़ करने लगते हो...
सलीम- और बातें काटना कोई आपसे सीखे... एक तो तारीफ़ कर रहा हूँ, मगर यह कोई नयी तारीफ नहीं है... सब लोग पहले से ही हुस्न की तारीफ़ करते चले आए हैं... मेरा नाम भी उन्हीं में शामिल हो गया...
फरहा- ज़रा संभालकर आना... ट्रेन में आजकल बहुत खतरे हो गए हैं... लटकना बिल्कुल मत... बहुत भीड़ रहती है यहाँ, जैसे सारी दुनिया के मुसाफिर यहीं आ गए हों... और ये रेलवे वाले भी कम नहीं हैं... टिकट के पैसे लेकर सबको एक ही डिब्बे में घुसने की इजाजत देदेते हैं, फ़िर चाहे कोई गिरे या मरे ... इनकी बला से....
सलीम- रेलवे वालों को कोसने से कुछ नहीं होगा, हमको भी सावधानी बरतनी होगी... हमें भी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए, मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है जो की ट्रेन की छत पर बैठकर सफर करते हैं... यह भी कोई बात हुई...
फरहा- ठीक है,,, रेल के प्रवक्ता... अब ध्यान से सुनो... kandom लाना मत bhoolnaa , कल वाले सब khatm हो चुके हैं समझे...भूल गए तो समझो हम दोनों गए... आजकल ना जाने कितने तरह के रोग लग गए हैं... मैं तो विज्ञापन देखते-देखते ही थक गयी हूँ...क्या ये सच होते हैं ?
सलीम- बिल्कुल सच ही होते होंगे, अगर सरकार कहती है तो ग़लत थोड़े ही कहती होगी... वैसे कुछ लोग ये भी कहते हैं की कंडोम कम्पनियां अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए यौन रोग का हौव्वा खडा करती हैं... एड्स के नाम मात्र से ही लोगों को पसीने छोटने लगते हैं... पहले तो हर इंसान यही सोचता है की उसको कभी भी एड्स नहीं हो सकता... मगर जब हो जाए तो आत्महत्या तक की नौबत आ जाती है, कितने ही लोग ऐसे हैं जो मर जाते हैं...
फरहा- मरना ठीक नहीं है , यह किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता, बलिक हमको लड़ना चाहिए... जो भी परेशानी है उसका हल निकालना चाहिए...
सलीम- तुम सच कहती हो... मैं भी इन्हीं विचारों का हूँ...









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