Saturday, August 15, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-24

फरहा की बात सुनकर सलीम सुन्न रह गया ... उसको या तो पता चल ही गया था की फरहा बेहद मॉडर्न विचारों की लड़की है

, लेकिन वह इतनी ज्यादा खुलकर बात करेगी इस बारे में उसे कल्पना भी नहीं थी... सलीम उसके चरित्र के बारे में विचार करने लगा... उसकी हर बात पर विचार करने लगा... उसने कहा था की वह उसके लिए अपनी सहेली को भी उसके बिस्तर पर लिटा सकती है साथ ही ख़ुद भी उसकी सहेली के कहने पर सहेली के पति के साथ सो सकती है... इसका मतलब वह उससे सच्चा प्यार करने लगी है... फरहा ने उसकी शंका को कुरेदते हुए कहा-
- ऐसे क्या सोच रहे हो , जब मैं अपनी सहेली राजो को तुम्हारे साथ सुलाने की बात कर रही थी तब तो तुम बहुत खुश हो रहे थे, होठो पर मुस्कान नाच रही थी... मगर जब सहेली मुझसे कुछ मांगेगी तो मैं इनकार कैसे कर सकती हूँ... यह भी तो सोचिये की मुझे उस पर कितना बड़ा बड़ा भरोसा है की वह मेरे कहने पर तुम्हारे साथ हमबिस्तर हो सकती है ... क्या तुम्हारी बीवी तुम्हारे कहने से किसी पराये मर्द के साथ चाहे वह तुम्हारा दोस्त ही क्यों ना हो, हमबिस्तर हो सकती है क्या ?
सलीम- सवाल ही नहीं उठता , भले ही मेरे बिना कहे वह कुछ भी क्यों ना करती हो मगर मेरे कहने से इतना नहीं कर सकती... इसकी छोडिये, मेरे कहने पर वह मेरा सर तो दबा ही नहीं सकती है...
फरहा- इसकी फ़िक्र मत करो... मैं तो इशारे भर से ही सर तो क्या गला भी दबा दूंगी... हा हा हा ....मजाक कर रही हूँ यार... तुम भी ऐसी बात करते हो पुराने जमाने की सी ... अब ये कहो की जब मेरे पाँव दुखने लगें तो तुम क्या करोगे ? क्या मुझे दर्द से कराहता हुआ छोड़ दोगे...
सलीम- नहीं... पहले मैं ख़ुद पैर दबाऊंगा... फ़िर डॉक्टर के पास ले जाऊँगा... एलोपैथिक दवा देने से पहले मैं चाहूँगा की तुम ऐसे ही सेवा पानी से ठीक हो जाओ... क्योकि ज्यादा दर्दनिवारक दवाएं सीधा किडनी पर असर करती हैं...
फरहा- और ऐसा तुम किसलिए करोगे ? इसीलिए ना क्योंकि मुझसे मोहब्बत करते हो... अगर हम लोगों के बीच प्यार नहीं रहेगा तो समझो कोई किसीके बारे में नहीं सोचेगा... सब लोग प्यार में ही अपना सब कुछ लुटाने के लिए टायर रहते हैं... मैं भी सोच रहा हूँ की तुम्हारे लिए एक फ्लेट बुक करवा डालूँ... अगर इस घर पर वह हक़ जताने लगी तो हम दोनों उस पर रह तो सकते हैं... कोई टेंशन तो नहीं रहेगी... किसी दिन चलना मेरे साथ नई बिल्डिंग बन रही है , भाव भी फिलहाल अच्छा ही है... मेरी जान पहचान के लोग भी हैं...तुम्हारे और मेरे नाम से बुक करा देंगे॥ दोनों का नाम रहेगा तो अच्छा है...
फरहा- मैं चाहती हूँ की फ्लेट तुम अपने नाम से ही खरीदो... लेकिन यह भी तो तुम्हारे नाम से ही होगा...तुमने इस पर लोन भी लिया होगा... लोन लिया होगा तो डिपार्टमेंट से सब्सिडी भी मिलती होगी... अगर दूसरा फ्लेट भी लोन से खरीदोगे तो तकलीफ नहीं होगी... सब्सिडी का लफडा नहीं होगा क्या ?
सलीम- हाँ यार... मैंने तो कभी यह सोचा ही नहीं था... तो ठीक है... अब ऐसा करते हैं की तुम्हारे नाम से ही बुक कर देते हैं...यही ठीक रहेगा...कल का कल ये काम करा देंगे...
फरहा- मेरे इन्कमटेक्स के पेपर नहीं हैं, मुझे कौन देगा लोन ? कुछ भी फैसला करने से पहले यह भी तो सोचो...
सलीम- ये पेपर बनवाने कोई बड़ी बात नहीं है... थोड़ी देर में ही यह सब हो जाएगा... चार दिन में सब हो जाता है मुंबई में... मैं एक सी ऐ को जानता हूँ... तुम इस बात की ज़रा भी फ़िक्र मत करो....
फरहा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा... जो वह सोच रही थी वह तो सलीम पहले से ही सोचकर बैठा था...उसके दिल में आया की झूम झूमकर खूब नाचे... उसे सलीम जैसे आशिक की कबसे तलाश थी... यह सोसायटी उसके लिए कितनी लकी है,, कदम रखते ही उसको मनमाफिक यार मिल गया था... खाने -पीने की रोजाना की टेंशन ख़त्म, कपड़े की दिक्कत नहीं... लाईट, फोन की परेशानी नही... और क्या चाहिए इंसान को जिन्दगी में ? फ्लेट का वादा हो ही गया... सोने के गहने भी बन गए... अब उसे सलीम की अगली पगार का इन्तजार करना चाहिए , ऐसा ना हो की उकता जाए और उससे विमुख हो जाए, अपना हर्ष छिपाने के लिए वह सलीम से लिपटकर मोहब्बत का इजहार करने लगी... धीरे -धीरे दो जिस्म आपस में मिलकर गरमी पैदा करने लगे... उन दोनों ने उत्तेजना के सागर को पार करते हुए मन के हर मनसूबे को पूरा किया... दोनों ही खुश थे... सलीम को जवान जिस्म की चाहत थी और फरहा को दौलत की चमक अच्छी लगती थी... अपने -अपने हिसाब से उन दोनों को ही इच्छित चीजें मिल गयी थीं...

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