Thursday, August 6, 2009

दिलफेंक पडोसन , भाग-15

वह जानता था की आजकल की लड़कियां चुप बैठने वाली नहीं हैं, उसका जिस्म हासिल करने के बाद अगर शादी में ना नुकर की गयी तो वाज बबाले जान भी बन सकती है... तभी तो वह हर कदम फूंक- फूंककर रख रहा था... मगर यह क्या , वह तो अचानक उसके कमरे में अकेली आ गयी थी... फ़िर उसने अपने आप पर काबू भी रखा लेकिन ज्यादा कंट्रोल नहीं रख पाया , आखिरकार वह भी एक साधारण इंसान था कोई साधू तो नही... उसके जज्बात भी मचल उठे , वह भी फिसल गया और वह फरहा के बदन का स्वाद चख बैठा... फरहा बाथरूम में फ्रेश होने गयी थी, जब वह आयी तो सलीम fresh
होने चला गया...उसके बाद उन दोनों ने टीवी देखना आरम्भ किया... इसके बाद सलीम ने एक सीडी चालू करदी, यह एक ब्लू फ़िल्म की सीडी थी... उसके चलते ही फरहा के तन-मन में आग लगने लगी... वह काम वासना की आग में झुलसने लगी...मन में तरह -तरह के ख़याल आने लगे... उस फ़िल्म का नायक बिल्कुल नग्न होकर नायिका के जिस्म को चूम रहा था... नायिका भी नग्न थी...वे दोनों सहवास से पूर्व किए जाने वाले रोमांस की मस्ती में तल्लीन थे... सलीम का संवेदनशील अंग शेर की तरह दहाड़ रहा था... उसकी नस-नस में जोश का संचार हो रहा था... उन द्रश्यों को देखकर तो सलीम और फरहा की साँस भी ऊपर नीचे होने लगी... समझ में नहीं आ रहा था की क्या किया जाए ? तभी सलीम ने फरहा को अपनी बांहों में भींच लिया... फरहा उसके होठों को चूमने लगी... दिल के अन्दर हिलोर सी उठने लगीं... ऐसा लगता था जैसे किसीने उनके अन्दर पेट्रोल भरकर माचिस की जलती हुयी तिल्ली उनके ऊपर फेंक दी हो... सलीम बोला-
-कैसी लगी यह फ़िल्म ? मजा आया की नहीं ? देखो मैं भी गर्म हो चुका हूँ...
फरहा- बस कुछ पूछो मत... मेरा भी तो बुरा हाल है... मेरी हालत देखो, क्या हो गयी है ?
सलीम- क्या फ़िर से इच्छाएं जाग्रत होने लगी हैं ? मन में तहलका मचने लगा है...
तुम्हारे दिल में बगाबत की जो भावनाएं उमड़ रही हैं, इनको जवान होने दो... जब बेचनी ज्यादा बढ़ने लगे तो मुझे याद करना... मैं तो सेवा करने के लिए तैयार हूँ ही...आख़िर मैं किस मर्ज की दवा हूँ ?
फरहा- तुम बड़े वो हो.... तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती क्या ? कितना खुलकर बात करते हो ?
सलीम- अब तुम्हारे और हमारे बीच बचा ही क्या है , सब कुछ तो ओपन हो गया है...,हम दोनों एक जिस्म दो जान बन चुके हैं... मैं तुमको अपनी शरीके हयात मान चुका हूँ... अपने दिल में बसा चुका हूँ... तुम्हारी हाँ का इन्तजार है, जब सिग्नल दोगी तब हम धार्मिक और सामाजिक रूप से भी एक दूसरे के हो जायेंगे...
फरहा- तुम भी कमाल करते हो... ऐसी -ऐसी बात कहते हो की बस.... मैं तो अन्दर से ही सहम जाती हूँ... मेरा मतलब है की मैं बेहद संवेदन शील हो जाती हूँ... कुछ अजीब सी हो जाती हूँ, समझ रहे हो न तुम ?
सलीम- फ़िक्र मत करो मैं सब कुछ समझ जाऊँगा... तुम सिर्फ़ कहती रहो... मुझे बहुत अच्छा लगता है... तुम मुस्कराती हो तो तुम्हारे ये मोटी जैसे दांत बहुत अच्छे लगते हैं... तुम्हारे अन्दर मन को लूटने के हर गुन मौजूद हैं... तुम्हारे पास ऐसी मदमस्त जवानी है की जो भी देखेगा वह पहली बार में ही आशिक बन जाएगा...
फरहा- और अपनी नहीं कहोगे... बिल्कुल हीरो जैसे लगते हो... मैं तो देखते ही खुश हो गयी थी... पहली नजर में ही तुम्हारा सुंदर चेहरा दिल की गहराइयों में बस गया...सच कहूं तो मुझे ही नहीं हर किसी को अच्छे लगोगे तुम...
सलीम- तुम मेरे दिल की धड़कन हो, मेरी खुशी हो, मेरे जीने का मकसद हो... मेरी हर अधूरी आरजू तुम ही तो हो... तुम्हारे बिना और कुछ नहीं है... सच कहता हूँ...तुम कभी मुझसे न रूठना वरना मैं कहीं का नहीं रहूँगा...
सलीम की बातों से वहां का माहोल थोडा सा भावुक हो गया था मगर जब उन दोनों ने टीवी की तरफ़ निगाह दौडाई तो फ़िर से काम वासना का तूफ़ान उठने लगा... फ़िल्म में अब वह मजबूत नायक पतली सी नायिका को अपनियो बान्हीं में लेकर उसके अंग प्रत्यंग को कली की तरह मसल रहा था... नायिका भी किसी तरह का कोई विरोध नहीं जाता रही थी, उल्टे वह उसका साथ दे रही थी... सलीम ने भी फरहा के सीने को मसलना चालू कर दिया... थोड़ी देर में ही फरहा का बदन कामोत्तेजना की भट्टी में सुलगने लगा... जो ब्लू फ़िल्म चल रही थी, उसमे नायिका ने नायक के अंग को पकड़ रखा था और आहिस्ता हिला रही थी... फ़िल्म का नायक कामशक्ति बढ़ाने वाली वाली अश्व्तुल नामक दवा का सेवन कर रहा था... वह नायक सहवास करने से पहले यह दवा खाया करता था...







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