Friday, May 6, 2011

भाग -३
सलमा - बहुत चालाक और घाघ किस्म के नजर आते हो, जितने सादा तुम दिख रहे हो उतने हो नहीं. आज पहली बार मिले हो औअर पहली ही बार में दोस्ती का ऑफर रख दिया . अब मेरे करीब आना चाहते हो . कल को न जाने क्या -क्या करने की सोचोगे . समझ में आ रही है कहानी .
जुनैब - करते -करते आखिर मैं क्या कर लूंगा . सिवाय प्यार के . इस जवानी का और होता भी क्या है. जो सब लोग करते हैं, मैं भी वही करूँगा . हाँ, ये वादा रहा की मैं जो भी करूँगा वह तुम्हारी सहमति से करूँगा . तुम्हारी मर्जी के बिना कभी कुछ नहीं करूँगा . अगर तुम्हारा मन बदलता है और तुम मेरे साथ अकेले में प्यार का खेल खेलना चाहती हो तो मैं सहयोग जरूर करूँगा . एक इशारे पर जान लुटाने की तमन्ना और इरादा रखता हूँ.
सलमा - कहते सब हैं , करता कौन है ? लड़कों को तो बस डायलोग मारने का भूत सवार रहता है. वे बातें कहाँ लग रही हैं, या उन बातों से किसीके जीवन पर क्या असर पड़ता है, इसका तो कुछ सोचते ही नहीं हैं आप लोग.
जुनैब - सब लोग एक जैसे नहीं होते . तुम्हारे हाथों की सभी उँगलियाँ भी एक जैसी नहीं हैं. तब आप ऐसा क्यों सोचती हैं की सारे लड़के भी एक जैसे ही होंगे . साफ़ -साफ़ कहे देता हूँ,. तुम मुझे अच्छी लगीं, सिर्फ अच्छी नहीं म, बहुत अच्छी . तुम्हें देखा तो दिलो दिमाग में ऐसे ख़याल आने लगे , जैसे तुम्हारा और मेरा किसी और जन्म का नाता है. जैसे हम कभी मिल चुके हैं, साथ-साह रह चुके हैं, जैसे की हमारे साथ रहने की आरजू का कभी गला घोंटा गया है और ऐसा लगा जैसे की मालिक ने हम दोनों को फिर से इसी मकसद से मिलवाया है ताकि अधूरा मिलना पूरा हो चुके और हमारी जो ख्वाहिशें पूरी नहीं हो पाई उन्हें पूरी कर सकें .
सलमा- मुझे लगता है जैसे तुम जादूगर हो, मुझे बहला-फुसला रहे हो और अपना कोई मकसद हल करने के इरादे से मेरे साथ इतनी मुलायम बातें कर रहे हो. आज तो इतने प्यार से बतलाते हो मगर जब मैं भी समर्पित हो जाउंगी तो लाठी -डंडों से पीटने लगोगे, हुक्म चलाने लगोगे .
जुनैब- ऐसा हरगिज नहीं होगा. अब सर आ गए हैं. बात यहीं पर खत्म करते हैं और शाम को मैं तुम्हारा लव गार्डन में इन्तजार करूँगा . मैं कैंटीन में मिलूंगा . वहाँ फुर्सत में बातचीत होंगी .
सलमा ने इनकार में ऐसे गर्दन हिलाई मानो कह रही हो '- बैठे रहना मैं नहीं आने वाली '. फिर शाम का वो हसीं समय भी आ ही गया जब जुनैब को सलमा से मिलना था. वह बैठा रहा . एक -एक पल एक -एक दिन के बराबर लग रहा था. उसकी निगाहें सड़क की तरफ लगी थीं, उस कैंटीन में ज्यादा देर बैठना मनाना था इसलिए वह बार-बार चाय मंगा लिया करता था ताकि कैंटीन वाला कुक ह न बोल सके. वैसे तो वह स्थानीय सांसद का इकलौता बेटा था. अगर चाहता तो सब लोग उसे सर पर बिठा लेते लेकिन वह अपनी पहचान सार्वजनिक करने से हिचकिचाता था. और इसका उसे फायदा भी मिला था . अगर उसे सब लोग पहचानने लगते तो वह इस तरह बेफिक्र होकर नहीं घूम सकता था. धीरे -धीरे दो घंटे बीत गए मगर सलमा का कहींअता-पता नहीं था. वह बेचैन था, और उसका दिल सीने से बाहर निकलने को बेताब होने लगा . सब लोग लौटने लगे थे. लव गार्डन में ज्यादातर प्रेमी जोड़े ही घूमने के लियी आया करते थे. शाम होते ही सब वहाँ से लौटने लगते थे. भीड़ अब कम हो रही थी. जुनैब दिल थामकर बैठा था. सोच रहा था की सलमा आयेगी या नहीं आयेगी . उसका दिल कहता था की वह जरूर आयेगी और बुद्धि कहती की कोई किसी अजनबी से मिलने ऐसी अनजान जगह पर क्यों आयेगी ? अभी वह ख्यालों में खोया ही था की उसकी आँखों में अचानक चमक उभरी . सलमा अकेली उस तारफ चली आ रही थी. उसने ध्यान से देखा की सलमा ने टैक्सी बहुत दूर खड़ी करदी थी , उसे छोड़ने के बाद टैक्सी के लौटने की आवाज भी सुनाई दी. जुनैब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा , आज अगर कोई दुनिया की सारी सम्पात्ति भी उसके क़दमों में डाल देता तब भी उसे इतनी खुशी नहीं होती जितनी की उसे सलमा के आने से हुई . सलाम के होठों पर मुस्कान नाच रही थी. उसे आते ही जुनैब ने शिकायत दर्ज कराई -
- आप भी कमाल करती हैं, शाम को आने का वादा था और अब रात में आयी हो .
सलमा- गलत, हमने ऐसा कोई वादा किया ही नहीं था. आपने इकतरफा प्रस्ताव रखा और अकेले ही उसे पास भी आकर दिया , बिना मेरी राय जाने .
जुनैब - अगर वो फैसला इकतरफा था, पये आकर्षण , ये लगाव इकतरफा है तो रात में तुम अकली यहाँ क्या कर रही हो ?
सलमा- देश आजाद है, कोई कहीं भी आ जा सकता है, किसी पर कोई रुकावट तो नहीं. इस गार्डन में हजारों लोग घूमने -फिनर के लिये आये हैं तो क्या ये निष्कर्ष निकाला जाए की सब आपसे ही मिलने के लिए आये हैं.
जुनैब- मेरे कहने का मतलब ये तो नहीं था. मैं तो ये बताना चाहता हूँ की तुम्हारे इन्तजार में मेरी क्या हालार्ट हो गयी है .

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