Friday, December 19, 2008

रंगीला रतन ,भाग-५३

मेरा मतलब ये था की जैसे तुम्हें अच्छा लगेगा मैं भी वैसे ही करूँगा... जिसमे तुम राजी , उसमे हम राजी... मैं यही कहना चाह रहा हूँ... इसके बदले में मेरे जुबान से न जाने क्या -क्या निकल रहा है...
रंजना- कोई बात नहीं... मैं फ़िर भी बुरा नहीं मानूंगी... जो भी कहना है कहो, तभी तो दिल के अन्दर की आवाज को मुझ तक पहुचा पाओगे... वैसे इस वक्त तुम कर क्या रहे हो ?
शारिक- कंप्यूटर के सामने बैठा चैटिंग कर रहा हूँ... एक पाकिस्तान की लड़की है ... बार-बार आती है और थोडी सी बात करके फ़िर गायब हो जाती है... मैं भी आज फुर्सत में हूँ...
रंजना- अच्छा, एक ही टाइम में डबल गेम खेल रहे हो ... समझ गयी... उँगलियाँ कंप्यूटर पर और मोबाइल कान पर ... मान गए उस्ताद... क्या नाम है जिससे चैट कर रहे हो ?
शारिक- नाम तो फरजाना बताया है, पर कौन जाने उसका असली नाम क्या होगा ? हो सकता है उसका नाम और यहाँ तक की पहचान भी नकली हो... ये भी हो सकता है की वह महिला ही न हो ... आजकल नेट पर ऐसा ही गोलमाल चलता है... ज्यादातर प्रोफाइल फर्जी होते हैं... सब गोरखधंधा चल रहा है...
रंजना- जान बूझकर भी जाल में क्यों फंस रहे हो ?
शारिक - आदत जो पड़ चुकी है... नेट का नशा ऐसा है की एक बार जिसको आदत लग गयी उसको समझो लग गयी... फ़िर खाना भी अच्छा नहीं लगता... मुझे मालूम है की जिससे बात हो रही हैं वह व्यक्ति जालसाज भी हो सकता है , इसके बावजूद रोजाना बेसब्री से इन्तजार रहता है... कितने ही लोग बरबाद हो रहे हैं... फ्री चैट की बात तो खैर ठीक है, अब यहाँ पर रुपयों के बदले बात कराई जा रही हैं... क्रेडिट कार्ड जिंदाबाद .... बेवजह पैसे की बर्बादी हो रही है... वहाँ पर भी सच्चाई कम और ठगी ज्यादा हो रही है.... हम जैसे लोग जान कर भी अनजान बन रहे हैं...
रंजना- ओह, ये बात है, मतलब आदत से मजबूर हो चुके हो ?
शारिक -मैं सिर्फ़ अपनी नहीं , सभी लड़कों की बात कर रहा हूँ... मैं भी हांलाकि उसमे शामिल हूँ मगर बहुत कम समय से ... दोस्तों को देख-देखकर ही इस लफडे में फंसा हूँ... अब सब ठीक हो जायेगा... तुम जो मिल गयी हो...
रंजना- अभी तो बात ही हुईं हैं, मुलाक़ात नहीं.... अगर मैं भी नेट जैसी चीटर निकली तब क्या करोगे ?
शारिक- मेरा दिल कहता है की ऐसा नहीं होगा... जिसके विचार सुंदर होते हैं वे ख़ुद भी बेहद हसीं होते हैं... मैं तो सुन्दरता का पैमाना भी अच्छे विचार और सिद्धांत के आधार पर मानता हूँ...
रंजना- बातें अच्छी बना लेते हो ?
शारिक- तुम्ही से सीखने की कोशिश कर रहा हूँ... मुझसे मुलाक़ात करते समय तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है... मेरा उद्देश्य कुछ ग़लत नहीं है.... मैं भरोसेमंद भी हूँ... तुम आँख बंद कर मुझ पपर भरोसा कर सकती हो... मैं प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखता हूँ...
रंजना- इसका अर्थ ये हुआ की बहुत जिद्दी भी हो ? मानोगे नहीं मिले बिना ?

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