Monday, December 15, 2008

रंगीला रतन, भाग-49

कभी-कभी महसूस होता है जैसे मैं खुली आखों से सपना देख रहा हूँ...
ठीक तभी रवि की दूकान मालिक ने रवि को झकझोरकर कहा-
- तू सचमुच सपना देख रहा है रवि, अरे तुझे तो बुखार चढ़ रहा है... ये लोग कह रहे हैं की यहाँ पर एक लड़की आई थी, कहीं ऐसा तो नहीं उसी चुडैल ने तुझे कुछ खिला दिया हो ?पुलिस में शिकायत दर्ज करादूं?
रवि- नहीं सेठ जी, उसके ख़िलाफ़ शिकायत लिखवाने की कोई जरूरत नहीं है... इसमें उसकी कोई कमी नहीं है...
सेठ- मगर तू तो अभी कह रहा था की वह जादूगरनी है...
रवि- सपने में बुदबुदा रहा होउंगा ... वो बातें छोडिये... मुझे थोड़ा सा आराम करने दीजिये... मैं ख़ुद ही ठीक हो जाउंगा... सचमुच मुझे तन्हाई की जरूरत है...
सेठ- चल, किसी डॉक्टर से दवा दिल्वादूं ?
रवि -इस वक्त मुझे दवाओं की नहीं, दुआओं की जरूरत है... मेरा मतलब है तुम्हारे आशीर्वाद से मैं जल्द ही अच्छा हो जाऊँगा... अब तुम दुकान संभालो... सुबह से मैं ख़ुद दुकान पर बैठना शुरू कर दूंगा...
सेठ समझ नहीं पाया की रवि आख़िर क्या कह रहा है ? वह तो अपनी ही उलझनों का शिकार था... ऊपर से यह नई मुसीबत आ गयी... उसका दिमाग भन्ना गया... वह चुपचाप अपनी दुकान पर जा बैठा... रवि अपने मीठे सपनों में खो गया... उधर रंजना मुंबई पहुच गयी ... मुंबई में उसका मन नहीं लग रहा था... रवि की याद रह-रह कर सता रही थी... वह डॉक्टर जैसे सम्मानित पेशे से ताल्लुक रखती थी, इसी कारण समाज में उसको एक विशेष इज्जत प्राप्त थी... वह नहीं चाहती थी की लोग उसके चरित्र पर कीचड उछालें ... यही वजह थी की वह दूर-दूर के रवि जैसे लड़कों के साथ अपने जिस्म की प्यास बुझाया करती थी... मुंबई में उसको ऐसे लड़के मिलने मुश्किल हो रहे थे जो शारीरिक रूप से मजबूत हों और भरोसेमंद भी , किसी से इन संबंधों की चर्चा न करे... दिक्कत ये थी की ऐसा लड़का मिलेगा कहाँ और कैसे ? इस मामले में किसी को भी राजदार बनाने का मतलब था अपने ही हाथों से अपनी कब्र खोदना... उसका दिन तो क्लीनिक के काम में ही बीत गया मगर रात कटनी भारी हो रही थी... शाम होते ही उसने जाम छलकाने शुरू कर दिए... जब नशा होने लगा तो तन की भूख सताने लगी... बदन में अकडन सी होने लगी... उसने एक जोरदार अंगडाई ली ...इसके बाद उसकी निगाह एक अंग्रेजी अखबार पढा... उसमें कुछ विज्ञापन उसको अच्छे लगे... एक विज्ञापन का मजमून इस प्रकार था-देशी-विदेशी पर्यटकों की मालिश करने के लिए मेल-फी मेल के आवश्यकता है... रोजाना १० से २० हजार कमाने का स्वर्ण अवसर... इस विज्ञापन को पढ़ते ही उसकी आंखों में चमक उभर आई... उसने सोचा ,क्यों न एक नया नंबर खरीदकर अखबारों में विज्ञापन दिया जाए की महिलाओं की मालिश करने वाले स्मार्ट , युवा लड़कों की आवश्यकता है... लेकिन फ़िर ख़याल आया की फ़ोन नंबर देने से तकलीफें भी हो सकती हैं... किसी का भी फोन कभी भी आ सकता है... न जाने कब किसका फोन आ जाए .... फ़िर उसको ई मेल का विचार आया... ई मेल पर वह बायोडाटा और फोटो भी मांगा सकती थी ... उससे यह आइडिया मिल सकता था की सामने वाला लड़का किस तरह का है... उसको ज्यादा लोगों में से किसी एक को चुनने का अवसर भी मिल सकता था...

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