Friday, December 12, 2008

रंगीला रतन भाग-४६

रंजना जब रवि को रमेश के साथ गुजारे अंतरण क्षणों के बारे में बताती तो उसके तन-मन में आग लग जाती... वह रंजना की बातों को नजरअंदाज करने लगा... वह कामवासना की आग में बुरी तरह से झुलस रहा था... उसके जेहन में इस वक्त सिर्फ़ रंजना की कातिल जवानी ही कौंध रही थी.... उसने बेचैन होकर कहा-
- आह... आनंद की कोई सीमा नहीं है... इतना सुख तो शायद स्वर्ग जाने वालों को भी नसीब नहीं होता होगा....
रंजना- ठीक कहते हो... आज तो कुछ ज्यादा ही मजा मिल रहा है...
रवि- ऐसे आलम में किसी बीते वक्त की बातें करना उचित होगा क्या ? अगर हाँ तो मुझे खुशी होगी...
रंजना- बहुत स्मार्ट हो गए हो रवि , काफी टोल-मोलकर बोलने लगे हो...
रवि- तुम्हारे साथ रहकर अगर इतना भी नहीं सीख पाया तो क्या फायदा होगा ? जब तुम दिल्ली छोड़कर चली जाओगी तो हरदम तुम्हारे बारे में ही सोचा करूँगा... साथियों को बताया करूँगा की किस तरह एक परी मेरे सपने में आई और फ़िर किस तरह वह मेरी दुनिया बदलकर चली गयी...एक दिन टीवी पर मैंने एक फ़िल्म देखि थी , उसमे हीरो एक डायलोग मारता है... हीरो इन से कहता है की "तुम बहुत अमीर हो मेमसाब, मुझ जैसे गरीब के साथ एकाध रात गुजारना भले ही तुम्हारे लिए तफरीह जैसी छोटी बात होगी मगर हमारे लिए तो यह हजार जिन्दगी जी लेने के समान है " ... मैं उस हीरो की तरह तो तुमसे नहीं कह सकता... क्योंकि फ़िल्म और हकीकत में बहुत अन्तर होता है... इसलिए उस फर्क को यहाँ पर महसूस भी तो होना चाहिए...
रंजना ने रची गालों को चूम लिया... वह उसको जितना गंवार समझ रही था, वास्तब में वह इतना था नहीं... वह जब धीरे-धीरे खुलने लगा तो रंजना को उस पर प्यार आ गया... वह उसके जिस्म से लिपट गयी और उसे वस्त्र की तरह धारण करने लगी... अब रंजना की समझ में आया की समझदारी सिर्फ़ ज्यादा पढ़ लिख लेने से ही नहीं आ जाती... उसके लिए प्राकृतिक देन और माहोल का भी बहुत बड़ा असर होता है... रवि पूरे जोश में था... उसको इस बात की भी खुशी थी की आहिस्ता-आअहिस्ता उसका जादू रंजना के सर चढ़कर बोलने लगा था... दिल्ली में उसका वास्ता सभी तरह के लोगों से पड़ता रहता था... इस कारण वह होशियार हो गया था... उसने अंग्रेजी भाषा के कुछ शब्दों को ऐसे याद कर लिया था और उन शब्दों को इस अंदाज में बोलता था मानो इस भाषा का बहुत बड़ा ज्ञाता हो... रंजना की तारीफ करती हुई बोली-
- इसका मतलब ये हुआ की अगर तुम मुंबई आ गए तो मराठी भाषा बहुत जल्दी सीख जाओगे... तुम्हारे अन्दर संभावनाए अंजर आ रही हैं... जिसके अन्दर सीखने की लगन होती है वह सब कुछ जान जाता है...
रवि- कुछ बातें तो मैं अब भी जानता हूँ... हमारे पड़ोस में एक सुनार की दूकान है... वह मूल रूप से महाराष्ट्र का ही रहने वाला है... वह बताता है की वहाँ पर प्याज को कांदा और बहन को ताई कहते हैं....
रवि की इस मासूम सी बात पर रंजना खूब खिलखिलाकर हंस पडी ... दोनों प्यार की ऐसी दुनिया में मगन थे जहाँ कोई दुःख का नाम भी नहीं होता है...

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