Friday, December 26, 2008

रंगीला रतन, भाग-59

शारिक- तुम शायद अनुमान भी नहीं लगा पाओगी... मैं बता भी नहीं पाऊंगा, लेकिन ये तय है की कुछ कर गुजरुंगा , फ़िर जो कुछ भी होगा , उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं ... समझ रही हो न तुम ? अगर मैं ये जानता की अंजाम इतना बुरा होगा तो यहाँ कभी नहीं आता... यहाँ तो जान पर बन आयी है...
रंजना- मुझसे कहो न , आख़िर दिक्कत क्या है ? क्यों अपने आपको कोसने में लगे हुए हो ?
शारिक- कुछ कहूं तो आफत , न कहूं तो मुसीबत ... समझो न फंस गया हूँ... मेरा मन अब मेरे काबू में नहीं है ... ऐसा लगता है जैसे मेरे दिल में शैतान बैठ गया है... कोई मुझे अन्दर से उकसा रहा है... अगर कोई गुनाह हो गया तो क्या होगा ? मैं तो कहीं का नहीं रहूँगा... पुलिस स्टेशन, कोर्ट कचहरी और फ़िर अखबार टी.वी का लफडा... आजकल ऐसे मामलों में मीडिया कुछ ज्यादा ही सतर्क हो गया है ...
रंजना- जो तुम्हारे मन में चल रहा है , उसे पूरा करके देखो... यकीन मानो, कुछ नहीं होगा... प्रयोग तो करके देखो, एक बार मेरी बात मानकर तो देखो ...
शारिक -कभी किसी ने मरकर यह जानने का प्रयास किया है की मरने के बाद कैसा अनुभव होता है ? अगर किया भी होगा तो क्या वह अनुभव उसके किसी काम आया ? बेचारा चला गया ...
रंजना- तुम बेवजह डर रहे हो... चलो , मालिश करो... अच्छा थोडी देर तक करो, फ़िर यदि जाने की इच्छा हो तो तुम्हें रोकूंगी नहीं, सिर्फ़ थोडी सी देर...
शारिक का गुप अंग दहाडें मार रहा था... एक हाथ से वह कभी -कभी उस अंग को दबाने का प्रयास कर लेता था, इस प्रयास का असर उल्टा ही होने लगा ... वह उसको दबाने की जितनी कोशिशें करता, वह उतना ही दहाड़ मारने लगता... वासना के गर्मी में वह अपने वजूद को पिघलता हुआ महसूस कर रहा था...एक पल वह भी आया जब उसका विशेष अंग रंजना की कमर से जा टकराया ... स्पर्श होते ही रंजना के बदन में बिकली सी कौंध गयी... काम भावनाएं जाग्रत हो उठीं ... अब वह हाथ घुमाकर उसे अपने हाथों से स्पर्श कर आनंद की अद्भुत अनुभूति करना छाती थी, तब ही शारिक पीछे हट गया ... रंजना ने उसको अपनेकरीब बुलाया , इतना करीब की आसानी से वह अपने मन की इच्छा पूरी कर सके ... आखिरकार उसकी हार्दिक इच्छा पूरी हो गयी... शारिक भी बदहवास हो गया और रंजना भी... वह कहने लगी-
- शारिक, क्या तुम मुझसे प्यार करने की इच्छा रखते हो, मगर कहने में झिझक रहे हो ?
शारिक- ये सब तुम कैसे जानती हो ... तुम्हारी कांपती हुई आवाज यह बताने के लिए काफ़ी है... मैं ग़लत तो नही कह रही हूँ...
शारिक -असली नब्ज़ पकड़ ली तुमने... मैं इसी बात को बताने से डर रहा था... तुमने पहले हियो इतना दारा दिया था की कुछ भी कहने या करने सेपहले ही डर लग रहा था... जुबान काँप रही थी...
रंजना- तुम्हारा हाल देख कर मैंने निर्णय किया है की आज तुम्हें रोकूंगी नहीं, तोकुंगी नहीं... तुम जो चाहो,जैसे चाहो कर सकते हो... इस जवानी का जी भरके आनंद उठा सकते हो... हाँ , मैं कुछ नहीं कहूँगा...
शारिक - बाद में ऐसा तो नहीं होगा जैसे यहाँ मुंबई में एक बार एक विदेशी महिला ने किया था...
रंजना- क्या किया था उस विदेशी महिला ने ?
शारिक- पहले तो उसने अपने साथी के साथ सम्भोग किया और बाद में कंडोम लेकर पुलिस स्टेशन चली गयी ... उसके साथी को बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था...









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