रंजना का हाल इससे ज्यादा अलग नहीं था, वह भी अपने से कम उम्र के जवान लड़के के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाकर खुश थी... मन ही मन इश्वर को धन्यवाद दे रही थी... वह मांस खाने में यकीन रखती थी, हड्डियाँ गले में लटकाने में नहीं... रवि को मुंबई ले जाना उसको अच्छा नहीं लग रहा था,फ़िर भी उसकी जिद को देखते हुए कह दिया-
-इस बार तो जाना सम्भव नहीं होगा , हाँ अगली बार आउंगी तो जरूर इस बारे में गंभीरता पूर्वक विचार किया जायेगा... किसी भी काम में जल्दबाजी ठीक नहीं रहती... सोच समझकर किया गया काम हमेशा सफल होता है...
रवि- जाओ, जहाँ जाओगी हमें पाओगी... हम ऐसी चीज नहीं जिसे पत्ते पर रखकर खाया और हाथ चाटकर फेक दिया... हम तो जीने -मरने तक के साथी हैं... आसानी से नहीं भुला पाओगी...
रंजना- ये क्या कह रहे हो रवि, तुम्हें कौन कमबख्त भुलाना चाहता है... तुम कोई भुलाने वाले दोस्त हो ? मैं पल-पल तुम्हें याद करती रहूंगी... दूर रहने से सच्चा प्यार कभी कम नहीं होता , उलटा बढ़ जाता है... मैं तुम्हें रोज फोन किया करुँगी ... तब ऐसा लगेगा जैसे हम लोग साथ में ही रह रहे हैं...
रवि- जैसा भी करोगी, ठीक ही करोगी... मैं इतना जानता नहीं हूँ...
रंजना- मालिस करके तुमने मेरा पूरा शरीर फूल जैसा हल्का कर दिया है... अब मैं बेहद राहत महसूस कर रही हूँ...
रवि- मैं तो सेवक हूँ , अगर मुंबई भी आऊंगा तो इसी तरह की सेवा करता रहूँगा...
रंजना एक बार फ़िर सोच में पड़ गयी... रवि की बात में उसको दम नजर आ रहा था... उसको कहीं किराए के कमरे पर रखा जा सकता था और जरूरत पड़ने पर तलब भी किया जा सकता था... उसने रवि से एकपैग तैयार करने को कहा... आधा पीने के बाद उसने आधा पैग रवि की तरफ़ बढ़ा दिया... रवि ने आदेश का पालन किया ... इसके बाद उनके बीच एक बार फ़िर प्रणय क्रीडा शुरू हो गयी... रंजना के नग्न जिस्म की मालिस करते -करते रवि की भावनाएं भड़क उठी थीं... उसकी आंखों की पुतलियाँ सुर्ख लाल हो चुकी थीं... वासना की आग से बदन झुलसने लगा... रंजना का गदराया हुआ बदन भी अकड़ने लगा था... उसको रवि के आक्रमण का इन्तजार था... धीरी-धीरे वे दोनों करीब आए, एक दूसरे के होठों को चूमने के बाद उन दोनों के गर्म शरीर आपस में रगड़ने लगे... उन दोनों की गर्म साँसें एक दूसरे की साँसों से टकराकर क़यामत का माहोल पैदा कर रही थीं... जब रवि ने रंजना को अपने कब्जे में लेकर उस पर हावी होना शुरू किया तो रंजना के मुख से आह निकलनी आरम्भ हो गईं... मचलकर वह बोली-
- अब जो सुख मिल रहा है, काश हमेशा यही आनंद मिलता रहे...
रवि- बिल्कुल मिलेगा, क्यों नहीं मिलेगा ? न तुमने कभी किसी का अहित किया है और न ही मैंने किसी का बुरा किया है... इसलिए बेफिक्र रहो हमारे जीवन में सदा सुख ही सुख रहेंगे... कभी दुःख नहीं आयेंगे...
Tuesday, December 2, 2008
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