Thursday, December 4, 2008

रंगीला रतन , भाग-३८

रमेश को अपनी भूल का एहसास होने लगा... हसीं महिला के पहलू में लेटकर उसको टाइम पास वाली बात नहीं करनी चाहिए थी... उसने अगले ही पल रंजना की गोलाइयों को दबाना शुरू कर दिया... रंजना का जिस्म ज्वालामुखी की तरह तप रहा था... उसने वही आग अब अपने बदन में लगानी चाही ... रंजना उसकी भावनाओं से अनभिज्ञ नहीं थी... वह तो हर हाल में रवि के साथ जीवन का सर्वश्रेष्ट सुख भोगना चाहती थी... उसने अपने बैग से एक डीवीडी निकालकर चालू करदी... उसके अन्दर बड़े भयानक द्रश्य थे... जैसे ही फ़िल्म शुरू हुई, परदे पर तबाही मचनी शुरू हो गयी... एक गठे हुए जिस्म का लड़का अपने से दुगुनी उम्र की महिला पर हावी हो रहा था... यह इतना खतरनाक सीन था की इसे देखते ही रवि के दिलो -दिमाग में वासना की चिंगारियां सुलगने लगीं... वह अब और भी आक्रामक हो गया ... इसका असर ये हुआ की रंजना की साँसें पहले से भी तेज चलने लगीं....वह कह रही थी-
- कैसा लग रहा है रवि ? ऐसी फ़िल्म इससे पहले कभी देखि की नहीं ?
रवि- बिल्कुल नहीं... कहाँ से देखता ? कभी फुर्सत ही नहीं मिलती... यहाँ तक की सादा फ़िल्म देखने का मौका भी कम ही मिलता है... अब इसे देख रहा हूँ तो अच्छा लग रहा है... जाते-जाते कुछ फिल्में छोड़ती जाना ....
रंजना- छोड़ तो खैर जाउंगी मगर इसे देखकर जब तुम्हारी काम वासना जाग्रत हो उठेगी तो क्या करोगे ?
रवि - अपने आपको संभालने की क्षमता मेरे पास है... मैं तुम्हारे सिवाय किसी और लड़की के बारे में सोच भी नहीं सकता... मैं इन्तजार करूँगा... जब तुम आओगी, तभी प्यार की बातें होंगी...
टीवी स्क्रीन पर अब जो सीन उभर रहे थे, वे पहले से ज्यादा कामुक थे... रवि ने देखा की फ़िल्म के पात्र रति क्रीडा में लीन थे... रवि ने उत्सुकता से पूछा -
-इस फ़िल्म के कलाकार सचमुच ऐसा कर रहे हैं या फ़िर ये महज़ कैमरा की कारस्तानी है ?
रंजना- कैमरा इतना सब नहीं कर सकता ... जो ये हो रहा है, वाकई करना पड़ा होगा... बिना किए फ़िल्म सम्भव नहीं ... फर्क अगर कैमरे से ही हो जाए तो फ़िर हीरो-हीरो इन की जरूरत ही क्या पड़े ?
रवि अब आपे से बाहर होने लगा... वह बेकाबू होने लगा था... उसकी आंखों की पुतलियाँ सुर्ख लाल हो चुकी थीं... रंजना का बदन भी तपने लगा... जब उसने कातिल अंगडाई ली तो रवि ने उसकी चिकनी जाँघों पर हाथ फिराना शुरू कर दिया ... दोनों ही क्लाइमेक्स की तरफ़ बढ़ने के लिए बेताब थे... रंजना ने जोश में भरकर उसको अपनी तरफ़ खींच लिया... रवि और उसके होठ आपस में मिल गए... दोनों तरफ़ से रस्साकसी तेज होने लगी... रवि ने कहा-
- ऐसा लगता है जैसे मेरा बदन फट जायेगा... बड़ी बैचैनी महसूस हो रही है... आह, मेरी जान बचालो...
रंजना-- इस आग में तुमने मुझे भी झुलसा दिया है, मेरी नस-नस में अग्नि प्रवाहित हो चुकी है... अब तो इस आग को जली ही रहने दो... ताकि इसका एहसास हमेशा -हमेशा के लिए बना रहे...
रवि- ऐसा न हो की इश्क की इस आग में हमारा वजूद ही भस्म हो जाए...



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