Monday, December 8, 2008

रंगीला रतन, भाग-42

उसका सीना गर्व से फूल रहा था... रंजना बेफिक्र थी... इतनी बेफिक्र की उसको दुनिया से जैसे कोई मतलब ही न हो... जल्द ही वे एक फाइव स्टार होटल के पास जाकर रुके... रवि ने ऊपर निगाह उठाई... इतने विशाल होटल की उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी... उसने हमेशा रोटी, कपड़ा और मकान तक का सपना ही देखा था... यह नजारा तो उसकी सोच से भी अलग था... रंजना ने होटल में जो कमरा बुक कराया था, वह और भी शानदार था... उसमे से ऐसी महक आ रही थी, जिससे शरीर तो शरीर आत्मा भी महकती जा रही थी... नीचे कालीन बिछी हुई थी... काफी देर तक तो रवि यह भी नहीं समझ पाया की उसको करना क्या है ? बैठना कहाँ है ? उस वक्त रंजना फ्रेश होने बाथरूम चली गयी थी... आते ही उसने कहा-
-तुम अभी तक खड़े क्यों हो ?बैठो आराम से ... आज हम इसी कमरे में रहने वाले हैं... आज मैं बहुत खुश हूँ... केई सालों के बाद मुझे इतनी खुशी नसीब हुई है... आज इस खुशी को सेलिब्रेट करते हैं...
रवि ने थोडी सी शरारत से काम लिया ... वह बेड पर अकेला लेटने के बजाय रंजना को भी लेकर गिर पड़ा... अब वह रंजना के गालों को चूम रहा था... रंजना ने अपने दहकते हुए होठ रवि के होठों से सटा दिए... रवि के दिमाग में झन्नाटा छा गया... उसका संवेदनशील अंग जोर-जोर से दहाडें मार रहा था... रंजना उस अंग से विशेष प्यार करने लगी... उसको सहलाने से रंजना को सुखद अनुभूति का एहसास होता था... रंजना की इस हरकत से रवि के मन में काम वासना की आंधी चलने लगती थी... वह उग्र होकर रंजना के सीने पर दबाव बढ़ाने लगता था... रंजन इसके बाद जब गर्म आह भरने लगती तो वह और भी बेचैन हो जाता... रंजना का अंदाज वाकई बेहद कातिल था... उसका फिगर भी जबरदस्त था... वह सुबह-सुबह नियमित तौर पर सर करने जाती थी तथा व्यायाम करती थी... इसी कारण उसका बदन आकर्षक हो गया था... उसके पेट पर ज़रा भी अतिरिक्त चर्बी दिखाई नहीं देती थी... उसके चेहरे पर भी गज़ब की चमक थी... रही सही कसर उसके बेबाक अंदाज से पूरी हो जाया करती थी... जब रवि ने उसके कपडों को हटाना शुरू किया तो वह थोड़ा सा विरोध करने लगी मानो इशारा कर रही हो की अभी नहीं... मगर रवि पर तो जैसे दीवानगी का जूनून सवार था... वह अपनी धुन में मगन था, रंजना की गोलाइयों से प्यार कर रहा था, इस बीच जो भी रुकावटें आयीं , उसने सबको पार किया... हर रुकावट को काबू में करना उसको बखूबी आता था... रंजना हर पल कामुक होती जा रही थी... रवि ने पूछा-
-यह इनकार कैसा है ? दिल की धडकनों का हाल भी तो समझो... ये क्या कहती हैं ?
रंजना- हाँ, हाँ, सब समझती हूँ... मगर वक्त की नजाकत को भी समझो... यह समय प्यार करने का है... मगर तुम, तुम तो सीधे मंजिल की तरफ़ दौड़ने लगते हो...
रवि- सफर पर मेरी कोशिश यही रहती है की जितना जल्दी हो सके अपनी मंजिल पर पहुच जाना चाहिए , आख़िर मकसदभी तो वही होता है...
रंजना- लेकिन जो आनंद धीरे-धीरे चलने में है, वह सरपट दौड़ने में कहाँ ?
रवि- बेफिक्र रहो, मैं खूब संभल -संभलकर चलता हूँ, न तो ख़ुद गिरूंगा और न ही गिरने दूंगा...

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