मनाया जा सकता है ? अगर एक बार मिल लूँगा तो सब जान जाऊँगा... मेरा यकीन करो, मैं फ़िर तुम्हें तुमसे भी जयादा जानने लगूंगा... इसीलिए तो मैं मुलाक़ात करने का इच्छुक हूँ...
रंजना- तुम बच्चों जैसी हाथ कर रहे हो ... मैं कोशिश करती हूँ... तुम चाहो तो फोन काट सकते हो... तुम्हारा चार्ज लग रहा होगा, मैं अपनी तरफ़ से फोन करती हूँ...
शारिक- इसकी कोई जरूरत नहीं है... मेरे पास ऐसा कार्ड है जिसका बिल नहीं भरना पड़ेगा... भले ही मैं कितना भी यूज करुँ... तभी तो तो मैं इतनी देर से बिंदास बात कर रहा हूँ... बिल देना पड़े तो हालत ख़राब हो जाए...
रंजना- अच्छा ये बात है , मगर ऐसा करना बुरी बात है... ये तो धोखाधड़ी है...
शारिक - ऐसे खांचा कार्ड मार्केट में आजकल खूब बिक रहे हैं... मैं अकेला थोड़े ही हूँ...
रंजना- किसी और के गुनाह करने से हमारा अपना गुनाह तो कम नहीं हो जाता शारिक... ग़लत हमेशा ग़लत ही होता है... अगर और लोग भी यह धोखाधड़ी कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह नहीं की हमको भी ऐसा करने का लाइसेंस मिल जाता है... समझ रहे हो न तुम ?
शारिक को उस वक्त रंजना की बातें बहुत बुरी लगीं , उसे लगा जैसे किसी ने उसको खुली सड़क पर नंगा कर दिया हो... लेकिन अगले ही पल रंजना की बात सुनकर वह चौंक पड़ा... वह कह रही थी-
- मैं तुम्हारे फोन का बिल हर महीने चुका दिया करुँगी... तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं है... इसके लिए किसी कम्पनी को धोखा देने की भी जरूरत नहीं... तुम नहीं जानते, यह कितनी बुरी आदत होती है... शुरुआत में लगता है की यह सामान्य सी बात है ... इसी कारण वह अपनी गलती को दोहराता रहता है... बाद में जब उसको अपनी भूल का एहसास होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है... इसलिए मैं तुम्हें ऐसी सलाह दे रही हूँ... आगे से अगर तुम्हें पता चले की कोई बाजार में इस तरह का कार्ड बेच रहा है तो इसकी शिकायत तुंरत पुलिस के पास करना...
शारिक- ठीक है , मैं यह भी मंजूर करता हूँ... मगर मुलाक़ात आज और अभी करनी पड़ेगी... मालिश भले ही कभी करवाना , एक बार दर्शन दे दो...
रंजना- तुम्हारे मन में कोई फर्क तो नहीं आ रहा है... मेरा मतलब , नीयत तो साफ़ है ?
शारिक - हाँ, मैं ;;;; मैंने क्या कहा ? मैंने तो कुछ कहा भी नहीं...
रंजना- मैं कहने की नहीं सोचने की बात कर रही हूँ.... तुम्हारे दिल में पाप तो नहीं पनप रहा ? ध्यान रहे , तुम्हें मालिश अंधेरे में करनी होगी... मेरे शरीर का कोई भी अंग नहीं देख पाओगे... यहाँ तक की चेहरा भी नहीं...
शारिक- मुझे मंजूर है... मैं तो ख़ुद भी यही चाहता हूँ...
रंजना-- काया ? की तुम मुझे न देखो ?
शारिक- नहीं ...हाँ, ओह, यह मुझे क्या हो रहा है?
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