Sunday, December 7, 2008
रंगीला रतन, भाग-41
रवि के दिल में लड्डू फूटने लगे... अब तक उसने बड़े होटलों के बारे में सिर्फ़ सुन रखा था... उसकी हैसियत इतनी भी नहीं थी की उनमे ठहरने के विषय में सोच भी सके... वह तो होटल में ठहरने और खाने को फिजूलखर्ची और बड़े लोगों के चोचले समझा करता था... उसका हिसाब लगाने का तरीका भी एकदम अलग था... वह अनुमान लगता की अगर दिन भर रहने और खाने का बड़े होटल में दस हजार रुपये भी लगते हैं तो वहाँ खाने की क्या जरूरत है, वही खाना घर में पूरा परिवार सौ रुपये में ही पेट भरके खा सकता है... शेष पैसे से एक दस किलो रोजाना दूध देने वाली भैंस खरीदी जा सकती है... वह भैंस कई साल तक परिवार को दूध औए घी खिलाएगी... उसके मन में विचार उठा की काश, रंजना बड़े होटल में जाने का विचार त्याफ्दे तो वह उसको अच्छे से अच्छा खाना बनाकर खिला सकता है... जो पैसे वह होटल में क्ल्हार्च क्लारने जा रही है उनसे वह अपने परिवार की गरीबी को कुछ कम कर सकता था... उसने रंजना के चेहरे की तरफ़ देखा भी मगर कुछ कह नही पाया... सोचा , अभी से उस पर अपनी इच्छाएं थोपना ठीक नहीं है...
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