Tuesday, December 9, 2008

रंगीला रतन ,भाग-44

बुरा न मानो तो एक बात कहती हूँ,मर्द और गिरगिट में ज्यादा फर्क नहीं होता...ये दोनों ही कब रंग बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता... इनका स्वभाव मैं आज तक नहीं समझ पाई...इनके दिल की थाह ही नहीं मिल पाती...
रवि- तुम्हारी बात का बुरा मानकर कहाँ जाऊँगा... अगर तुम ये कह रही हो तो सच ही होगा... मुझे तो तुम्हारी हर बात का भरोसा है... जो कहोगी, सोच विचारकर ही कहोगी... दरअसल मुझे तो मानव स्वभाव , मनोविज्ञान और इंसानी रिश्तों के बारे में कुछ जानकारी ही नहीं है... ज्यादा पढा-लिखा भी नहीं हूँ... अभी दुनियादारी देखि भी नहीं है... ले देकर जो सीख रहा हूँ, तुमसे ही सीख रहा हूँ...
रंजना- तुम इसलिए और भी प्यारे लगते हो... कोई बात काटते भी नहीं... अपना विचार भी नहीं रखते...
रवि- अब तुम्हारे साथ रह रह कर समझने लगूंगा...
रंजना- मैं रमेश की बेवफाई की दास्ताँ सुना रही थी... जब वह मेरे साथ बिस्तर पर होता तो खूब मीठी-मीठी बात करता था... मेरी हर बात मानता था... यहाँ तक की हमेशा मेरे ही तलवे चाटता रहता था... मुझसे दूर जाते ही वह रागिनी के पहलू में गम ग़लत करने लगता... उसके संसर्ग से रागिनी को एक बेटी भी पैदा हो गयी... एक दिन हवाई दुर्घटना में रागिनी के पति की मौत हो गयी...तबसे वह स्थाई रूप से रागिनी के पास ही रहने लगा... बिना शादी किए ही वे दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे थे... धीरे-धीरे रागिनी भी रमेश की रंगीन मिजाजी को समझने लगी थी... जब उसने खर्चा देना कम किया तो रमेश जिगोलो बनकर अपना खर्च निकालने लगा था... इस दौरान उसने एक लड़की को धखा दे दिया... प्यार का नाटक करके वह उसके साथ अन्तरंग सम्बन्ध तो बना बैठा मगर जब वह कुँवारी ही माँ बन बैठी तो उसने गर्भपात कराने की सोची... उस लड़की को सातवा महीना लग चुका था... डॉक्टर कह चुके थे की ऐसे समय गर्भपात कराना खतरे से खाली नहीं होगा... वह लड़की एक लीडर की थी... रवि को जब लगा की जान फंसने वाली है तो उसने हर हालत में लड़की का गर्भपात कराने का निर्णय लिया... वह गर्भवती लड़की को लेकर मेरे पिता के क्लीनिक आया... वहाँ भी उसको निराशा हाथ लगी तो वह मेरे पिता के पैरों पर गिरकर गिदगिदाने लगा... वहाँ पर उसने ख़ुद को उस लड़की का पति बताया था... पारिवारिक कलह का वास्ता देकर वह मेरे पिता को कनवेंस करने में सफल हो गया... लड़की कम उम्र की थी... गर्भपात के दौरान उसकी मौत हो गयी... पुलिस केस बनते-बनते बच्चा... आखिरकार रागिनी ने अपने ऊंचे रसूख का फायदा उठाकर मामले को रफा-दफा कर दिया ... हांलाकि उसके कुकर्म की जानकारी मेरे पिता को भी लग गयी और रागिनी को भी... तबसे रागिनी उससे और भी ज्यादा चिढ गयी ... वह उस्ससे कटी-कटी रहने लगी थी... उसका व्यवसाय भी बड़ा था... वह उसमें उलझी रहती थी... उसी बीच रमेश ने मुझे भी अपने झूठे प्यार के जाल में फंसा लिया था... जब मेरे घरवालों को इसकी भनक लगी तो वे अवाक रह गए... वे लोग रमेश की हरकतों के बारे में जानते थे... इसीलिए उससे बेहद चिढ़ते थे... मैं उसके प्यार में दीवानी हो चकी थी... जिस पर प्यार का रंग एक बार चढ़ जाए फ़िर वह उतारे नहीं उतरता... मेरि९ उम्र भी कम थी और अनुभव भी... मेरे घरवाले रमेश से जितनी नफरत करते, मैं उससे कई गुनी मोहब्बत रमेश से करने लगती... उस वक्त मेरे दिलो दिमाग पर रमेश ही रमेश छाया था... रात को सोते समय हभी वही दिखाई देता और जागने पर भी... उसी प्यार की आग ने मेरा सब कुछ जलाकर भस्म कर दिया...

No comments: