Saturday, December 20, 2008

रंगीला रतन, भाग-54

शारिक- मैं और कर भी क्या सकता हूँ , सिवाय जिद के ? इसके अलावा तो आपने अभी से कई बंदिशें लगा दी हैं ... जैसे की मैं जयादा सवाल नहीं कर सकता , तुम्हें उजाले में नहीं देख सकता ,और यहाँ तक की ?
रंजना- बस-बस अब रहने भी दो, इतने सवालों का जवाब मैं कैसे दे पाउंगी ? एक साथ थकाने का इरादा है क्या ? हौले-हौले पूछा करो, हौले -हौले सब का जवाब मिल जायेगा... उत्सुकता अच्छी बात है मगर हद भी न होने पाये...
शारिक- कमाल करती हैं आप ... सब्र करने को कहती हैं ... यहाँ जान अटकी पडी है ,और आप ,आप हैं की मुझ पर तरह -तरह की पाबंदियां लगा रही हैं... जब मैं आपको देख ही नहीं पाऊंगा, अंधेरे में तुम्हारे जिस्म की मालिश करनी पड़ेगी ,तो तुम भी मुझे नहीं देख पाओगी... इस तरह तो गज़ब हो जायेगा... अआप कैसे पह्चानेंगी मुझे ? आपको ऐसे तो आनंद ही नहीं आएगा...
रंजना- ओह, अब तुम आप पर आ गए ... पहले तो बड़े तुम-तुम कर रहे थे...
शारिक- हाँ, मैं कुछ परेशानी का अनुभव कर रहा हूँ... मेरे ख़याल से मुझे अब फोन रख देना चाहिए... तुम्हें तकलीफ हो रही होगी... ऐसा ठीक रहेगा न ?
रंजना- कैसा ठीक रहेगा ? ये सब सवाल मुझसे क्यों कर रहे हो ? जो भी चाहते हो, वो करो... जब फैसला कर ही लिया है तो फ़िर पूछने की क्या जरूरत आन पडी ?
शारिक- तो अब फोन पर तुम्हारी राजी पूछने में भी ऐतराज होने लगा... फोन गरम होने लगा था, इसलिए कह रहा था, अब नहीं कहूँगा... लेकिन अगर ऐसे ही बात करते रहे तो तुम तैयार कैसे होंगी ? अरे हाँ, एक बात ये बताओ की तुम मुझे पहचानोगी कैसे ? अंधेरे में तो तुम भी नहीं देख पाओगी न?या
अंधेरे में चेहरे पहचानने की कला भी जानने लगी हो क्या ?
रंजना- मेरे चेहरे पर मुखौटा लगा रहेगा... मैं तुम्हें देख पाउंगी, मगर तुम मुझे नहीं देख पाओगे ...
शारिक- ये क्या कह रही हो... दोस्त भी कहती हो और दोस्तों के साथ ये जासूसों जैसा व्यवहार भी करती हो ... यह सब सुनने में भी बेहद अजीब सा लग रहा है तो प्रत्यक्ष में कैसा लगेगा?
रंजना- तुम्हें क्या ऐतराज है ? मेरे ख्याल से तुमको सिर्फ़ अपने काम पर ध्यान देना चाहिए... आगे तुम्हारी इच्छा ... अगर चाहो तो हाँ करो , ना चाहो तो मैं किसी और से अपना काम करा लुंगी...
रंजना- नहीं , मुझे कोई ऐतराज नहीं है... मैं हर हाल में सेवा करने का इच्छुक हूँ.... आज तक मैंने किसी लड़की के बदन को टाच नहीं किया है... मैं महसूस करने का इच्छुक हूँ की उस वक्त कैसा लगता है ?
आह, बस उसी क्षण का इन्तजार है ... मैंने जबसे तुम्हारा एड पढा है ,तभी से यह सोचना शुरू कर दिया है मिलने पर ये बात कहूँगा, वो कहूँगा ... मगर तुम बीच में ही ये गजब कर रही हो...
रंजना- तो फ़िर नियम क़ानून भी तो मानने पड़ेंगे ही... तुम्हें उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए
शारिक- तुम्हारे जिस्म को स्पर्श करने के लिए अब अगर फांसी पर भी चढ़ना पड़े तो गम नहीं ...






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