Friday, January 28, 2011

बेवफा खंडहर , भाग-३५
अब सूरज से रहा नहीं गया. उसने किरण के होठों पर अपने होठ सटा दिए , उन दोनों के शरीर में चिंगारी सी भड़क उठी. कामवासना की आंधी चलने लगी . सूरज ने किरण के यौवन उभारों को को दबाना शुरू कर
दिया, किरण के जिस्म में आग लगी थी, सूरज उस आग को अपनी जीभ से बुझाने का प्रयास कर रहा था. किरण बोली-
- यह आग ऐसी नहीं है की इसे आसानी से बुझाया जा सके. यह इश्क की आग है मेरी जान.
सूरज- हाँ, मगर कोशिश पूरी करूँगा. अपने प्यार की छाप आपके जिस्म के हर कोने पर छोडना चाहता हूँ .
किरण- और मै तुम्हें आमंत्रित करती हूँ, आओ और मेरे तमाम दुखों पर अपने प्यार का मरहम लगादो. इस बेचैनी को मिटादो जों मुझे ज़िंदा भस्म किये जा रही है. इस बेकरारी की दवा करदो . अब अगर ज़रा भी देर
करदी तो सम्भव है की मेरे प्राण ही निकल जायेंगे .
सूरज- सूरज के रहते भी अगर किरण बेचैन रहती है तो यह हमारे लिए मर मिटने की बात है. मेरी बेचैनियों की दवा आपके पास और आपकी बेचैनियों की दवा मेरे पास है. और हम दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.
किरण की साँसें जोर-जोर से चलने लगी. यह वासना का तूफ़ान था, सूरज ने अपने आपको एडजस्ट किया और किरण पर छाने की कोशिश करने लगा . किरण भी इन्वोल्व हो गयी. वह उस हसीन वक्त
को बर्बाद करने के मूड में नहीं थी. अगले ही पल वे दोनों दो जिस्म एक जन बन चुके थे. गाँव का गबरू जवान सूरज पहलवानी अंदाज में जोर अजमाइश करने लगा. उसके प्रहार सख्त होते थे, मगर किरण
को कोई ऐतराज नहीं था , बल्कि वह तो उसे और प्रोत्साहित कर रही थी, साथ ही वह यह भी दिखाने की कोशिश कर रही थी जैसे उसे इस क्रिया में बड़ा आनंद आ रहा हो. तथा दुःख महसूस भी महसूस हो रहा हो .
दुःख दर्शाने का सिर्फ एक यही कारण था की सूरज को ऐसा लगना चाहिए जैसे उसने कम लोगों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं और उसे तकलीफ हो रही है. सूरज ने पूछ भी लिया-
-मै नया खिलाड़ी हूँ, मुझ कुछ करना नहीं आता. प्लीज बता देना, और हाँ, कैसा महसूस कर रही है मेरी जान. ?
किरण- जैसे धरती पर साक्षात स्वर्ग उतर आया हो . जन्नत जैसा आनंद आ रहा है .
सूरज- अगर ऐसा है तो फिर आह, ऊह क्यों कर रही हो ?
किरण- तुम नहीं समझोगे, जब औरत को चरम सुख और परम सुख की प्राप्ति होती है तब उसके मुख से इस तरह की आवाजें आती हैं.
सूरज- ओह, ये बात है क्या ? मै ठहरा अनाड़ी, मुझे कुछ ज्ञान ही नहीं है. यह तो मैन पहले ही बता चुका हूँ.
किरण- कहलो सूरज भले ही, लेकिन असली बात कुछ और ही नजर आती है. मुझे नहीं लगता की तुम बिलकुल कुंवारे हो.
सूरज- शक की वजह ?
किरण- जमाने की हवा. मैंने एक फिल्म देखी थी, फिल्म में एक सत्य कथा को दर्शाया गया था. उसमे साफ़ था की ज्यादातर लड़के १५ वर्ष के होते ही सेक्स का आनंद चखना शुरू कर देते हैं . तुम्हारी उम्र क्या है ?
सूरज- २५ के आसपास , मगर मैंने अब तक कभी किसी लड़की के साथ रतिक्रिया नहीं की है. सच तो ये है की मौक़ा ही नहीं मिला.
किरण- कभी कोशिश भी नहीं की क्या ?
सूरज- कोशिश के तहत ही तो यहाँ तक आ पहुंचा हूँ, दरअसल मेरे एक ममेरेभाई की ससुराल पास के ही इलाके में हैं. उसकी कई सालियाँ हैं. आसपास के घरों में भी जवान लड़कियां हैं. मैंने सोचा था की वहाँ जाकर
रात को रुकुंगा , किसी साली को पटाऊंगा और उसके साथ मौज मस्ती करके वापस आउंगा मगर ये हो न सका.
किरण- क्यों ? क्या परेशानी हुई ?
सूरज- असल में जब मैन ससुराल पहुंचा तो पता चला की घर के अधिकाँश लोग किसी रिश्तेदारी में गए हुए थे. वहां पर किसीकी शादी थी, गाँव में भी शादी -ब्याह का माहोल था. मुझे लगा की वहाँ का मौसम अपने लिए
अनुकूल नहीं है. इसलिए मै देर शाम को वहाँ से चलपड़ा , वैसे मैंने इन्तजार भी खूब किया था.
किरण- अगर आना ही था तो फोन करके आना चाहिए था, दिक्कत नहीं होती.
सूरज- तब तो भेद खुल जाता की मैन जानबूझकर आ रहा हूँ, मुझे यह दिखाना था की पास के गाँव में किसी काम से आया था , तो राजी खुशी लेने चला आया. अगर मै फोन करता तो लोग मेरी नीयत
पर शक करने लगते और सारा मामला गडबड हो जाता.

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