Sunday, January 23, 2011

भाग-31
किरण- दुनिया में अभी तक कोई ऐसा फांसी का फंदा नहीं बना है जों किसी रूह को मौत के घाट उतार सके. जिस्म को मौत आ सकती है मगर रूह को कभी नहीं.
सूरज- रूह , कैसी रूह ? मैन समझा नहीं. तुम्हारा रूह से क्या लेना देना ?
किरण- मेरा मतलब ये है की तुम अब मेरे जिस्म तक सीमित नहीं रहे बल्कि मेरी रूह की गहराइयों में समा चुके हो,
सूरज- जबसे तुम्हें मिला हूँ , मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल है. तुम भी मेरी रूह में समा चुकी हो. मेरे दिल की गहराइयों में बस चुकी हो
किरण- आज सूरज और किरण का मेल हो रहा है. जबकि किरण तो सूरज का ही एक छोटा सा हिस्सा है. इसलिए इस मिलन को तो कोई रोक ही नहीं सकता. अगर कोई रुकावट आ भी गयी तो उसे हर हाल में दूर
कर लिया जाएगा. मैंने यह तय किया है की तुम्हें किसी भी कीमत पर अपने आप से जुदा नहीं होने दूंगी.
सूरज- हाँ, मेरा अपना भी कुछ ऐसा ही ख़याल है. मै भी चाहता हूँ की मोहब्बत का ऐसा ही तूफ़ान मेरे अंदर भी समाहित हो जाए ताकि मै भी मजनूँ, रांझा आदि की तरह दीवाना बन सकू और मशहूर हो सकूँ.
किरण- बहुत दीवानगी याद आ रही है. जानते भी हो की इश्क में क्या -क्या खोना पड़ता है ? अरे जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है. कर पाओगे इतना ?
सूरज- हाँ, निश्चित रूप से ये कर पाऊंगा. तुम्हारे लिए तो अपने चमड़े की जूतियाँ बनाकर भी पहना सकता हूँ. सचमुच .
किरण- हाँ, अब यकीन आने लगा है. क्योंकि तुम्हारे शब्दों से जों सच्चाई झलक रही है, उससे यही साफ़ होता है की तुम्हें प्रेम का रोग लग गया है. अब मौक़ा भी है, मौसम भी है और आगे क्या कहते हैं ?
सूरज- शायद दस्तूर भी है. और वो हो या ना हो मगर मैन तो हूँ ही, मै हाजिर हूँ, हर तरह से . जों कहोगी करूँगा. मगर दिल में एक सवाल आ रहा है , इजाजत हो तो सवाल करूं ?
किरण- यह मोहबात का समय है, इश्क की इन्तिहाँ का समय है. इश्क का आनंद लूटिये. अब वक्त ज्यादा नहीं है.
सूरज- हाँ, मगर रुका नहीं जाता. सोचता हूँ की कह ही दूं, मैन यह जानना चाहता था की यहाँ पर इतना सन्नाटा क्यूँ है भाई ? यह होटल भुतहा जैसा क्यूँ लगता है. अगर कोई वेटर यहाँ पर आता भी है तो कुछ बोलता
क्यूँ नहीं है ? चुपचाप क्यूँ रहता है ? यह दीवारें भयानक क्यूँ लगती हैं ? माहौल ऐसा क्यूँ लगता है जैसे की जिस्म में सिहरन हो रही हो ?
किरण- करूर, मै तुम्हें ये बताउंगी. मगर इसके लिए कलेजा टाईट करना होगा . बताना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि तुम ये सवाल दूसरे बार पूछ रहे हो .
सूरज- हाँ, दिल को थाम लेता हूँ. अब बोलिए.
किरण- यहाँ जितने भी वेटर हैं, वे इंसान नहीं हैं. सब के सब भूत हैं. यानि की मर चुके हैं. मैन भी जीवित इंसान नहीं हूँ .
सूरज- यह क्या मजाक है ? आप तो बोल सकती हैं, सुन सकती हैं, समझ सकती हैं और आराम से चल -फिर भी सकती हैं. आपके पैर के पंजे भी पीछे की तरफ नहीं , आगे की तरफ हैं . मैंने सुना है की जों भूत होते हैं
उनके पैरों के पंजे आगे की तरफ नहीं बल्कि पीछे की तरफ होते हैं. आप अप्रैल फूल तो नहीं बना रही हैं ? मगर यह तो अप्रैल का महीना भी नहीं है.
किरण- मेरे बारे में तुम जों सोच रहे हो, वो सोच सकते हो क्योंकि तुम भी तो मृत हो. मौत हो चुकी है तुम्हारी.
सूरज- ये आप क्या कह रही हैं, सेक्स करने के समय इस तरह डराना क्या ठीक रहेगा ?
किरण-सच कहती हूँ मेरी जान, तुम्हारी मोटर साइकिल एक खम्भे से टकराई और तुम्हारा सिर फट गया, खून ज्यादा बहने के कारण तुम मर गए और तुम्हारी आत्मा भटककर इस तरफ आ गयी .
सूरज- मैन पागाक्ल हो जाउंगा, प्लीज इस तरह की वाहियात बातें मत करो.
किरण- जों सच है उसे स्वीकार करना होगा सूरज, सच्चाई यही है, ये जी शरीर तुम देख रहे हो, यह मायावी शरीर है, यानि की तुम सिर्फ महसूस कर रहे हो की यह है, मगर सच इसके विपरीत है. इस जिस्म का कोई अस्तित्व नहीं है.
सूरज- तो क्या हम जी रहे हैं वो मरने के बाद की लाइफ है ?
किरण- जी नहीं, यह सजा है. लाइफ तो एक बार ही मिलती है. उसके बाद जों लाइफ होती है , वह किसी को याद नहीं रहती.
सूरज का दिमाग झन्ना गया, उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या करे ? भ्रमित होकर वह अपने शरीर पर हाथ फिराने लगा, इसके बाद उसने किरण के सुन्दर जिस्म को स्पर्श किया. फिर वह आईने के सामने
खडा हो गया. वह नग्न अवस्था में था. उसका चेहरा बिलकुल वैसा ही था , जैसा कथित मौत से पहले था. वह अपनी पुरानी लाइफ को याद करने लगा. तभी किरण बोली-
- तुमने मेरी बात को सच मान लिया क्या ? हा हा हा ..........मजाक कर रही थी यार

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