Sunday, January 16, 2011

भाग-24
हीरो बन गयी थी, मैंने भी उस पर्चे को बड़ी एहतियात के साथ पढ़ा और नष्ट कर दिया. अबी मैं इतना तो जान गयी कि मैं अकेली नहीं हूँ , मेरे साथ वह महिला भी है. उसने पूछा -
- क्या सोच रही हो ?
किरण- यही कि वह ग्राहक कब तक आएगा. मुझे भूख लगी है. खाना भी इतना स्वाद है कि बस उँगलियाँ चाटते रहने को जी चाहता है.
महिला- बात तो कोई और है ?
किरण- सोचती हूँ कि पता नहीं कैसा आदमी होगा. प्यार से पेश आएगा या नफरत से. पता नहीं उसका अंग कितना खतरनाक होगा.
महिला- उसकी चिंता मत करो. कितना भी बड़ा क्यों न हो अपने आप सब कुछ एडजस्ट हो जाता है कुदरती तौर पर. मुझे ही देखलो मैं दिखती भले ही दुबली -पतली हूँ मगर सात फुट के हट्टे-कट्टे हव्सियों को भी
पानी पिलवा देती हूँ. थक जाते हैं मगर मैं नहीं थक पाती. दरअसल ये तो समुन्दर की तरह होती है. इसमें कुछ खास फर्क नहीं पड़ता.
किरण- इसका मतलब ये हुआ कि तुम खेली खाई खिलाड़ी हो. पूरा अनुभव हो गया है.
महिला- हाँ, और तुम भी इससे अछूती नहीं रहोगी, बहुत जल्द तुम भी मुझसे भी ज्यादा बड़ी खिलाड़ी बन जाओगी. तब तुम देख लेना , मुझे भी सिखाती नजर आयोगी. अब तैयार हो जाओ , तुम्हारा ग्राहक आने वाला है. मैसेज
आ गया. एक बार इस दवा से मुंह में कुल्ला करलो , शराब की बदबू निकल जायेगी. वरना ग्राहक को अच्छा नहीं लगेगा. कोशिश यही रहे कि ग्राहक खुश होकर जाना चाहिए.
किरण- ठीक है, ऐसा ही होगा. आपका ग्राहक यहाँ से खुश होकर जाएगा, और बार-बार मेरी सेवा लेना चाहेगा.
महिला- शाबाश, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी. और हाँ, अगर वह कोई सवाल करता है तो ज्यादा जवाब मत देना. पर्सनल जवाब तो बिलकुल नहीं. ध्यान रहे, तुम हर पल सी.सी. टी.वी. कैमरे की नजर में रहोगी .
किरण- मैं भला ज्यादा बात क्यों करने लगी. काम भर के लिए तो बोलना ही पडेगा. बाकी मुझे क्या लेना -देना ?
महिला- मैं इसलिए बोल रही हूँ क्योंकि आजकल टी.वी. चैनल वाले रिपोर्टर भी स्टिंग के चक्कर में आ जाते हैं. वे लोग बवाल खड़ा कर देते हैं. इससे होता तो कुछ नहीं है, लेकिन डिस्टर्ब तो होता ही है.
एक बार एक रिपोर्टर ग्राहक बनकर मेरे कमरे में ही आ गया था. लगा उलटे सीधे सवाल करने. मैं तो जान गयी कि वह कोई बहुरुपिया ही है. मैं भी एलर्ट हो गयी.
किरण- ओह, फिर क्या हुआ ? वह आपसे क्या जानना चाहता था ?
महिला- तुमने अभी तक मेरा नाम तक भी नहीं पूछा है, मैं खुद ही बता देती हूँ. मैं चांदनी हूँ. और उस लड़के ने अपना नाम चन्द्र बताया था. वह एक दलाल के जरिये यहाँ तक पहुंचा था. उसने एक फाइव स्टार होटल बुक
करके रखा था. मैं उससे पहले होटल पहुंचना चाहती थी लेकिन वह मुझे पहले से ही कमरे में मौजूद मिला. उसका हुलिया देखकर मुझे उसके रईस होने पर शक हुआ. ये तो मैं देखते ही पहचान गयी कि फाइव स्टार होटल
बुक करने की उसकी हैसियत नहीं है,
किरण- क्यों ? क्या हैसियत किसीके माथे पर लिखी होती है ?
चांदनी- जी नहीं, मैं बताती हूँ. उसकी उम्र २५ से ज्यादा नहीं होगी. अगर उम्र ज्यादा होती तो मैं समझ भी सकती थी. उसके कपडे भी सामान्य थी. उसके जुर्राब से भी बू आ रही थी. जिसका मतलब था कि वह एक या
दो दिन से धुले नहीं थे. इसके अलावा इस उम्र में भी वह झिझक नहीं रहा था. जबकि इस उम्र का सामान्य ग्राहक थोड़ा सा डरता है. यह ऐसी उम्र होती है कि ज्यादातर युवाओं को बाजारू औरतों के पास जाने की जरूरत
ही नहीं होती, वे कोई न कोई लड़की पटा ही लेते हैं. और पटाकर वे कहीं भी अपने तन की प्यास बुझा लेते हैं. इस उम्र में एक ही रात में अगर कोई युवा हजारों या लाख तक खर्च कर रहा है तो वह संदेह के घेरे में आ ही जाता
है. उसने मुझसे पहले सवाल में मेरा नाम पूछा, इसके बाद बोला-
- इस धंधे में कबसे हो ? और एक रात में कितना कमा लेती हो ?
किरण- इस सवाल से आपको भला क्या दिलचस्पी हो सकती है ? जहां तक मैं समझती हूँ , आप अपना धंधा तो शुरू करने वाले दीखते नहीं ?
चन्द्र- मैं जानना चाहता हूँ कि आप इस धंधे में कैसे आयीं ? किसी ने मजबूर किया या आर्थिक तंगी के कारण या फिर शौक से आ गयी ? मेरी जानकारी के लिए पूछ रहा था .
किरण- मेरे ख़याल से आप सब्जेक्ट से भटक रहे हैं. जिस काम के लिए आप आये हैं, उसे शुरू करें और खत्म करके चलते बनें.
चंद्र- तुम तो बड़ी बेरुखी से पेश आ रही हो . मैं कितने प्रेम से बात कर रहा हूँ और आप हैं कि ......
किरण- मैं भी तो प्रेम करने की बात कह रही हूँ. प्रेम कीजिये न. आप हमारे मेहमान हैं. आपने मुझे यहाँ पर बुलवाया है. इतना खर्चा किया है. मैं भला बेरुखी से बात क्यों करने लगी ?

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