भाग-27
चांदनी- एक लड़की की इज्जत लूटने का षड्यंत्र रचकर आप भी क्या साबित करने पर तुले हैं ? क्या इससे मर्दानगी झलकती है ?
चंद्र- मैं तुम सबकी पोल खोल दूंगा. जिस्मफरोशी के गिरोह का भंडाफोड कर , तुम्हारी टीम को नेस्तनाबूद कर दूंगा.
चांदनी- उससे पहले तुम कहींके नहीं रहोगे, तुम यहाँ से निकल भी नहीं पाओगे , तब तक तुम्हारी नई नवेली बीवी के पास यह फिल्म पहुँच चुकी होगी. तुम्हारे सीनियर के पास और यहाँ तक कि मालिक के पास भी सबूतों के साथ
यह सूचना पहुँच जायेगी. तुम्हारे कईसाथी चाहते हैं कि तुम्हें चैनल में नहीं बल्कि जेल में होना चाहिए. उसका भी इंतजाम कर लिया गया है. कच्चा नहीं बड़ा पक्का इंतजाम है . जहां तक मेरा अपना ख़याल है , ६ माह से
पहले तो जमानत भी नहीं हो पायेगी. फिर कहीं पत्रकारिता करने लायक भी नहीं रहोगे.
चांदनी यह कहानी अब किरण को ऐसे स्थान पर सुना रही थीं जहाँ पर कैमरा नहीं लगा था. वैसे तो चांदनी जिस्म्फरोसी का गिरोह चलाने वाले ब्रिज और अभिप्रिय की खास और भरोसेमंद सदस्य थी मगर इसके बावजूद भी वे उस पर नजर रखने
से बाज नहीं आते थे. लेकिन चांदनी भी होशियार थी, वह अपने लिए ऐसी खास जगह तलाश कर ही लेती थी , जहाँ तक उनके कैमरे की पहुँच न हो. चांदनी वैश्यावृति के धंधे में धोखे से लाई गयी थी, उसे यह काम पसंद
नहीं था मगर यह करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था. जब कोई ऐसी लड़की उसकी निगरानी में लाई जाती तो वह यथासंभव उसे समझाने का प्रयास करती थी. उसके बस में ज्यादा कुछ तो नहीं था. मगर जितना करती
थी उसीसे लोगों का भला हो जाया करता था. अगर वह किरण को नहीं संभालती तो उसके साथ भी लफडा हो जाता . शायद वह जीवित ही नहीं बच पाती. किरण यह बातें सूरज को सूना रही थी. सूरज मदहोश होने लगा .
एक तो शराब का नशा और ऊपर से कातिल जिस्म का नशा. वह बोला-
- वाह, मान गए. भगवान भी बचाने वाला पहले भेज देता है. अच्छा हुआ जों तुम्हें चांदनी जैसी मददगार वहां पर मिल गयी वरना गज़ब हो जाता .
किरण- हाँ, सूरज. मगर गज़ब तो तब भी हो ही चूका था. मेरी इज्जत लुट चुकी थी और वह कमबख्त ग्राहक भी वहां आ पहुंचा था जिसे मेरे लिए बुक किया गया था.
सूरज- ओह, फिर क्या हुआ ?
किरण- वह ग्राहक आया तब तक मैं एक पैग पी चुकी थी , मेरी झिझक खत्म हो चुकी थी. उसने आते ही गर्मजोशी से मुझसे हाथ मिलाया और मेरे गाल पर हल्का सा चुम्बन लिया. मैंने मुस्कराते हुए अपना परिचय दिया . वह बोला-
-यहाँ के लोग आपकी बहुत तारीफ़ कर रहे थे , मगर मिलकर लगा जैसे वह कम कर रहे थे. तुम तो हुस्न की परी हो.
किरण- शुक्रिया- आप भी कुछ कम नहीं हैं. आपका व्यक्तित्व एक कम्प्लीट मैन जैसा है. आपका शुभ नाम जान सकती हूँ ?
-सुनिया के लिए प्रिंस हूँ. आबेदीन शेख उर्फ प्रिंस , तुम तो अब अपनी जान हो चुकी हो. जों चाहो कहो.
किरण- आइये, आपका स्वागत है. मैन आपकी खिदमत में क्या पेश करूं, व्हिस्की, वोदका या कुछ और ?
प्रिंस- हम जों पीते हैं, उसे चांदनी जानती है. उसको हम पहले ही बता चुके हैं. जरूर ला रही होगी.
किरण- जी हाँ, बताया तो मुझे भी था, मगर मैंने सोचा कि मजाक कर रही है. वह कह रही थीं कि आपको यहाँ की देसी दारु पसंद है ?
प्रिंस- यहाँ मजाक नहीं , बिलकुल सच है. हमें यहाँ की दो चीजें बहुत पसंद हैं , एक तो हसीना और दूसरे देसी दारु. ऐसी चीजें हमारी दुबई में नहीं मिलती.
किरण- वाव, इसका मतलब आप दुबई में रहते हैं ? कितनी प्यारी जगह है. मेरे सपनों का शहर . अगर लाइफ में कभी विदेश जाने का मौक़ा मिला तो दुबई ही जाना चाहूंगी.
प्रिंस- यह इच्छा तो आपकी अभी पूरी हो सकती है. कहो तो टिकट बुक करा दूं ? क्या तुम इस देश से बाहर कहीं नहीं गयी ?
किरण- गयी तो कई देशों में हूँ , लेकिन घूमने का मौक़ा कभी नहीं मिला. हम तो फ्लाईट के साथ जाते-आते हैं. मै एअर होस्टेस हूँ. और जिस दुनिया के आप पुराने खिलाड़ी हैं, मैने उस दुनिया में आज ही दस्तक दी है.
प्रिंस- वेलकम, हमें भी नई-नई कलियाँ पसंद हैं. हमारा दुबई में मसाले का सबसे बड़ा बिजनेस है. वर्ड का शायद ऐसा कोई ही देश होगा जहाँ पर हमारा माल उपलब्ध न हो.
किरण- बहुत खुशी की बात है. आपके साथ ही चलती हूँ, यहाँ से मेरी बुकिंग करा लीजिए. आपको यहाँ पर अपना वक्त बर्बाद करने की क्या जरूरत है. जब सेवा वहाँ पर भी मिल सकती है .
प्रिंस- हाँ, ये भी बात है. मैन अभिप्रिय से बात कर लेता हूँ.
किरण- मेरी वहाँ घूमने की इच्छा है, ऐसा मत कहना. वरना वे आपसे हाई रेट मांगेंगे .
प्रिंस- वो सब तुम हम पर छोड़ दो. हम अपने तरीके से बात कर लेंगे. तुम्हारा पासपोर्ट चाहिए. वीजा वगैरह की औपचारिकताएं पूरी करवा देता हूँ.
Wednesday, January 19, 2011
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