Thursday, January 27, 2011

भाग-34
किरण- सबका तो नहीं पता, मगर मैं अपने भगवान को जान गयी हूँ, वह इस वक्त मेरे सामने है और मेरी बांहों में हैं.
सूरज- ऐसा नहीं कहते किरण, यह गलत है. पाप है, घमंड है. भगवान सिर्फ एक है और दूसरा कोई भी उसकी जगह नहीं ले सकता .
किरण- मैंने अपनी आँखों से कभी उस भगवान को नहीं देखा, अगर सारी दुनिया उसी भगवान की बनी हुई है तो आप भी तो उसीने बनाए होंगे, भगवान की रचना को अगर मैन देख सकती हूँ, उसे सुन सकती
हूँ, उसको समझ सकती हूँ तो उसे ही भगवान कहने में क्या हर्ज है ? मेरे अकेले के कहने से हो भी क्या जाएगा ? सारी दुनिया है न , उसे भगवान कहने के लिए .
सूरज- हमें अपने शब्द वापस लेने चाहिए किरण. हम लोग इंसान हैं और अगर इसके आगे एक शब्द 'अच्छा ' भी लग जाए तो बहुत बड़ी बात हो जाती है. इंसान हमेशा इंसान ही रहता है वह भगवान का दरजा प्राप्त नहीं कर सकता .
किरण- अच्छा ठीक है, तुम्हारा भी मन रख देती हूँ, मै अपने शब्दों में करेक्शन कर लेती हूँ, तुम बहुत अच्छे इंसान हो और भगवान तो नहीं मगर भगवान जैसे लगते हो. अब तो ठीक है ?
सूरज- आपकी कोई भी बात गलत तो हो ही नहीं सकती, इतना तो मैन भी समझता हूँ, क्योंकि आप मुझसे ज्यादा सुलझी हुई हैं, समझदार और अनुभवी हैं.
किरण- अब तारीफ़ करना बंद कीजिये, और साथ में शराब पीना भी . क्योंकि शराब के जाम तभी तक हलक में उतारने चाहिए जब तक की अपने आप पर नियंत्रण रखा जा सके. अगर शराब ही इंसान को पीना शुरू करदे तो स्थिति
बड़ी विचित्र हो जाती है. फिर पीने वाला मानव नहीं रह पाता. वह अमानवीय हरकतें करनी शुरू कर देता है.
सूरज- यह मजा भी खूब देती है और सजा भी. जब शराब हलक के अंदर होती है तो सारी दुनिया हसीन लगने लगती है. ऐसा महसूस होता है जैसे की सब कुछ कंट्रोल में है, हम सारे जग को कब्जे में कर सकते हैं.
किरण- मगर असलियत और एहसास में फर्क भी तो होता है. यह फर्क महसूस करना बड़ी बात है. जों इसे समझ ले वही समझदार कहलाता है.
सूरज- मुझे शराब की लत नहीं है. कभी-कभार पी लिया करता हूँ, आज सर्दी है न इसके लिए आज तो सचमुच पीने का मूड था.
किरण- इसे इतना ही पीना चाहिए जिससे की होश में रह सको और अपना उद्देश्य ठीक तरह से याद रख सको.
सूरज- तुम्हारे इस हसीन जिस्म का जादू ही इतना खतरनाक है की पीने की इच्छा ही नहीं होती, अब मै कम पीने की कोशिश करता हूँ.पिऊँगा तो इन नशीली आँखों के मयखाने से पी लूँगा.
किरण इस वक्त पूरी तरह से नग्न अवस्था में थी, हया दर्शाने के लिए उसने एक बेहद पतली चादर अपने ऊपर ओढ़ ली थी. उस लिबास में भी वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी, सूरज की काम भावनाएं बहुत पहले ही जाग्रत
हो चुकी थी, किरण जब उसके अंतरंग अंग को आहिस्ता सेस्पर्श करती तो जली हुई रस्सी काले नाग की तरह फुँकारने लगती थी. सूरज उसके अप्रितम सौंदर्य को निहारता ही रह गया. वह अपने एक हाथ से उसके जिस्म से
उस वस्त्र को उतर रहा था जिसने किरण के सुन्दर जिस्म को ढँक रखा था. किरण की मुस्कान इस वक्त ऐसी लग रही थी मानो कोई मस्त कली अभी-अभी खिलने की तैयारी कर रहा हो. उसके मुख से सहसा निकला-
- वाव, मेरे तो हाथ थरथरा रहे हीं. मेरे ख़याल से इस दुनिया में तो आपके जैसी मदमस्त हसीना कोई दूसरे नहीं होगी.
किरण- यह बदन सुलग रहा है, अरमान मचल रहे हैं.
सूरज- हाँ, मेरा भी यही हाल है. जज्बात अब काबू में नहीं हैं, इन पलों को अपने दिल में कैद कर लेना चाहता हूँ, सोचता हूँ की इसे इस नज़ारे को देखने के बाद अब कुछ और न देखूं. मेरी आँखें हमेशा के लिए
यहीं पर बंद हो जाएँ, ताकि मै हमेशा इस नज़ारे को याद रख सकूं.
किरण- नहीं बावले सूरज, किरण पर इतने फ़िदा भी मत हो जाना , तुम्हारी आँखें तो मेरा आइना हैं.
सूरज- ]और तुम हो मेरे जीने का मकसद . इस जिदगी में क्या अगले कुछ जन्मों में भी तुम्हें नहीं भुला पाऊंगा.
किरण- मुझे अपनी बाहों में इतना कसकर पकड़ो की फिर दुनिया की कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर पाए.
अब सूरज से रहा नहीं गया. उसने किरण के होठों पर अपने होठ सटा दिए , उन दोनों के शरीर में चिंगारी सी भड़क उठी. कामवासना की आंधी चलने लगी . सूरज ने किरण के यौवन उभारों को को दबाना शुरू कर
दिया, किरण के जिस्म में आग लगी थी, सूरज उस आग को अपनी जीभ से बुझाने का प्रयास कर रहा था. किरण बोली-
- यह आग ऐसी नहीं है की इसे आसानी से बुझाया जा सके. यह इश्क की आग है मेरी जान.
सूरज- हाँ, मगर कोशिश पूरी करूँगा. अपने प्यार की छाप आपके जिस्म के हर कोने पर छोडना चाहता हूँ .
किरण- और मै तुम्हें आमंत्रित करती हूँ, आओ और मेरे तमाम दुखों पर अपने प्यार का मरहम लगादो.

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