Saturday, January 15, 2011

भाग-23
किरण- मैं तो पूरे संसार में बदनाम हो जाउंगी , इस तरह का काम आपलोग क्यों कर आरहे हैं ?
महिला- जब तक तुम हमारी कंपनी की हाँ में हाँ मिलाओगी तब तक तुम्हें कोई तकलीफ होने वाली नहीं है. हमें जिसका फोटो दिखाना होता है उसे साईट ओपन करके दिकाह दिया जाता है. उस पर किसी भी लड़की
का ओरीजनल नाम नहीं लिखा होता बल्कि पेट नेम होता है. हम उसे वेबसाईट का एड्रेस भी नहीं बताते, तब तुम बदनाम कैसे हो जाओगी ,
किरण- और जों लड़की तुम्हारी बात नहीं मानती, उसके साथ क्या सलूक किया जाता है ?
महिला- उसे जग भर में बदनाम कर दिया जाता है. इतना ज्यादा बदनाम कि आत्महत्या करने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं बचता. जान जाने से तो यही बेहतर है कि चुप रहा जाए. अगर कोई लड़की इस सिद्धांत
को नहीं मानती तो भगवान को प्यारी हो जाती हैं, मैं तो दाद देना चाहूंगी तुम्हारी बुद्धिमानी को कि समय रहते तुमने अपने विचार बदल लिए वरना तुम्हें भी तकलीफ होती , वैसे भी देखिये न प्रकृति भी तो हमें यही सिखाती
है. कभी सर्दी, कभी गर्मी और कभी बरसात क्यों होती है, ? कभी विचार किया है ?
किरण- नहीं , मैं कभी इतनी बात नहीं सोच पाई, कभी टाइम भी नहीं मिला और इस बाबत विचार भी नहीं हो पाया.
महिला- मैं बताती हूँ, प्रकृति इन मौसमों के जरिये हमें यह सिखाती है कि समय -समय पर हमें अपनी आदतें और सोचने का जरिया भी बदलना चाहिए. अगर एक जैसे रहेंगे तो सफल नहीं हो पायेंगे , जैसे अगर दुनिया में
एक जैसा ही मौसम रहे तो कुछ होने वाला नहीं है. अगर गरमी ही गर्मी रहेगी तो लोग भूखे -प्यासे मर जायेंगे . ना तो पीने योग्य जल की पूर्ती हो पायेगी और ना ही कोई फसल ही हो पायेगी. संतुलन के लिए गर्मी, सर्दी
और वर्षा सभी की जरूरत पड़ती हैं. अब मैं अपना भाषण समाप्त करती हूँ, साथ ही तुम्हारे लिए स्पेशल सकोच का एक लार्ज पैग भी तैयार करके लाती हूँ.
किरण- हाँ, रात कजो पीई थी वह अभी तक उतर नहीं पाई है. उसके लिए उतारा चाहिए . मैं तो सखी थी कि तुम भूल ही गयी होंगी.
सूरज- अच्छा, इसका मतलब तुमने उन लोगों को बहकाने के लिए उन लोगों के सामने इस तरह का प्रदर्शन किया था ?
किरण- हाँ, उस महिला ने इशारों-इशारों में ही मुझे यह समझा दिया था कि मैं गलत जगह फंस गयी हूँ और होशियारी करने का मत्ल्बा है जान से हाह धोना. इसलिए मैं सावधान हो गयी. मुझे सोचने के लिए वक्त की जरूरत थी ,
मैंने अभिप्रिय की आँखों में अपने लिए एक विशेष चमक देखी थी, यही वजह थी कि मैं उससे एक बार मिलना चाहती थी . वही इस कंपनी का सरगना था और मैं उससे मिलकर प्यार से अपने साथ हुई घटना का इंतकाम लेना चाहती
थी, इसीलिए मैंने मन मसोसकर उस कंपनी में वैश्यावृत्ति का काम करना स्वीकार कर लिया. महिला की बातों से इतनी बात तो मैं भी समझ गयी थी कि दुश्मनी करके उन लोगों से जीतना संभव नहीं है , क्योंकि वे ताकतवर लोग
थे. उनकी पहुँच हर जगह तक थी. वे लोग मीडिया से लेकर हर जगह तक अपना वर्चस्व रखते थे.
सूरज- तब क्या हुआ ? वह महिला स्कोच का लार्ज पैग लेकर आई कि नहीं ?
किरण- हाँ, उसने अपना वादा पूरा किया . एक सावली सी सेविका के साथ वह फिर से मेरे सम्मुख हाजर हुई. सेविका जिस ट्रोली को धकेलकर लाई उसमे सब सामान मौजूद था. सेविका नजर झुकाकर चली गयी तो उसी ट्रोली
से फोल्डिंग टेबल निकालकर हमने अपने लिए चखने का सामन निकालना शुरू किया. कुछ अबदाम, कुछ नमकीन काजू , डाल सेव और चिकन के पकौड़े थे. मैंने चीअर्स बोलकर पैग होठों से लागा लिया . एक ही सांस में हम दोनों अपना- अपना
गिलास खत्म कर चुके थे. तभी उस महिला का मोबाइल घन घनाने लगा. उसने फोन रिसीव किया, थोड़ी देर बात हुई और फिर उसने एक पर्ची पर मुझे कुछ लिखकर दे दिया .
सूरज- वह पर्चा भी उसने गुप्त रूप से दिया होगा , क्या लिखा था उसमे ?
किरण- हाँ, एकदम कोने में जाकर लिखा था. वह जानती थी कि कौन सा क्षेत्र कैमरे की निगरानी से बचा हुआ है. उसमे लिखा था कि उसे आने वाला फोन बोस का था. वह खुश था . महिला को शाबाशी दे रहा था. उसकी नजर में महिला
हीरो बन गयी थी, मैंने भी उस पर्चे को बड़ी एहतियात के साथ पढ़ा और नष्ट कर दिया. अबी मैं इतना तो जान गयी कि मैं अकेली नहीं हूँ , मेरे साथ वह महिला भी है. उसने पूछा -
- क्या सोच रही हो ?
किरण- यही कि वह ग्राहक कब तक आएगा. मुझे भूख लगी है. खाना भी इतना स्वाद है कि बस उँगलियाँ चाटते रहने को जी चाहता है.
महिला- बात तो कोई और है ?
किरण- सोचती हूँ कि पता नहीं कैसा आदमी होगा. प्यार से पेश आएगा या नफरत से. पता नहीं उसका अंग कितना खतरनाक होगा.
महिला- उसकी चिंता मत करो. कितना भी बड़ा क्यों न हो अपने आप सब कुछ एडजस्ट हो जाता है कुदरती तौर पर.

No comments: