Monday, January 10, 2011

भाग- 18
किरण- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि पहले मैं सिर्फ अभी. के साथ सम्बन्ध बनाऊँ, अगर अच्छा लगा तो बात आगे बढाते हैं.
ब्रिज- मुझे कोई ऐतराज नहीं है.
अभी.- मगर मुझे है. अगर हम साथ-साथ प्यार नहीं कर सकते तो ये प्रोग्राम ही कैंसल कर देंगे.
किरण- तुम लोग तो खिलाड़ी हो, पहले भी यह खेल खेल चुके हो. मगर मैं इसकी नई खिलाड़ी हूँ.
ब्रिज- पहले सब लोग नए ही होते हैं. धीरे -धीरे वे भी पुराने हो जाते हैं.
किरण- अगर कुछ हुआ तो जिम्मेदारी तुम लोगों की होगी, मैं तो सीधे चली जाउंगी पुलिस स्टेशन.फिर दोष न देना , ये न कहना कि मैंने कहा नहीं था. मैंने अखबार में पढ़ा था कि दो विदेशी यहाँ पर घूमने आये थे
उनमे एक महिला थी और एक बड़े राजनीतिक घराने से जुड़ा मर्द था. उसने महिला के साथ उसकी मर्जी के बिना सम्बन्ध बना लिए इससे गुस्साई महिला अपने हाथ में कंडोम लेकर ही पुलिस स्टेशन पहुँच गयी,
सबूत के साथ , और फिर वही हुआ जों पुलिस करती है. गिरफ्तार भी हुए और बदनाम भी. अगर मेरे साथ ऐसी कोशिश हुई तो मैं भी पुलिस का सहारा ले सकती हूँ.
अभी.- तुम्हारे प्यार की खातिर अगर सूली भी चढना पड़े तो मंजूर है मगर यह देख लों कि हम तुम्हारे दोस्त हैं, बलात्कारी नहीं. अगर तुम्हारी भी सेक्स करने की भरपूर इच्छा हो तभी बात करना वरना हम अपने घर
और तुम अपने घर. जेल जाने का शौक किसीको नहीं होता, ये प्यार का सौदा है. अगर तुम्हें भी इस बात का रोमांच है कि तुम हम दोनों के साथ मौज मस्ती करना चाहती हो तो हाँ करो.
किरण- पहले मैं एक के साथ ही सम्बन्ध बनाना चाहती हूँ. ऐसा नहीं है कि मेरा मन नहीं है. मेरा भी बदन झुलस रहा है. मैं भी इस आग को शांत करना चाहती हूँ लेकिन इस तरह से नहीं .
ब्रिज- ठीक है , मैं चला जाता हूँ. तुम दोनों ही समबन्ध बना सकते हो, मेरी तरफ से कोई आपत्ति नहीं है. मैं तो तुम्हें सुख देने के हिसाब से ऐसा कह रहा था. वरना मेरी कोई व्यक्तिगत रूचि बिलकुल नहीं है.
अभी.- देखो डार्लिंग, तुमने आखिर मेरे सबसे प्यारे दोस्त को निराश कर दिया न, हम लोग आज यहाँ भले ही पहली बार मिल रहे हैं मगर यह सिर्फ एक दिन का मिलना तो है नहीं. अब तो हम लोग रोजाना मुआलाकात
करते रहेंगे, प्यार करते रहेंगे. जीवन में किसीके साथ ऐसा बर्ताब करना शोभा नहीं देता. जानती हो ब्रिज कौन है ? यह बहुत बड़े व्यापारी का बेटा है. इनकी खुद की एअर लाइन्स कंपनी है. कभी भी काम आ सकता है.
ब्नाहुत अच्छा बन्दा है और यहाँ पर हमारे रिक्वेस्ट पर आया है. मैं चाहता था कि आप नए तरह का आनंद भोगें , तभी तो मैंने इसे यहाँ बुलाया. मेरा अपना कोई काम थोड़े ही था. मैंने तो इसे आपके काम के लिए
बुलाया है. अब फैसला आपने कर ही लिया है तो क्या कहूँ, वैसे चाहो तो मैं इसे अब भी मना सकती हूँ. अगर तुम्हें ज़रा भी तकलीफ महसूस हो तो मना कर सकती हो. एक बात यह भी अच्छी तरह जानलो कि हम लोग
यहाँ पर दर्द देने के लिए नहीं बल्कि सुख देने के लिए इकठ्ठा हुए हैं. हम मौज मस्ती करना चाहते हैं. प्यार चाहते हैं. एक दूसरे को सुख मिलेगा तभी तो हम अगली बार मिल पायेंगे.
किरण- ठीक है. जैसा अच्छा लगे वैसा करो , अब मैं ज्यादा क्या कह सकती हूँ.
सूरज- ओह, तुमने हार मानली थी ?
किरण- और कर भी क्या सकती थी. उसने मेरे जिस्म में दवा के द्वारा इतनी मादकता पैदा करदी कि मैं इनकार ही नहीं कर पा रही थी . यहाँ कि मेरे जिस्म में बम विस्फोट जैसे हो रहे थे. दिल के अंदर तो यही इच्छा थी
कि वे दोनों मुझ पर भूखे भेडिये की तरह टूट पड़ें और जिस्म के अंदर फूट रहे ज्वालामुखी को शांत करें. वे खुद भी यही चाहते थे. तभी तो उन्होंने मुझे ऎसी ब्लू फिल्म दिखाई कि मैं काम वासना की आग में झुलस गयी .
मेरा बदन बेकाबू होने लगा था. ब्रिज खुश था . आखिरकार मैं मान जों गयी थी. कुछ देर बाद ही ब्रिज भी पूरी तरह से नग्न हो गया. ब्रिज दिखने में जितना दुबला-पतला था उसका खास अंग उतना ही जयादा मजबूत था. उसे देखकर
मेरे मन में झुरझुरी सी दौड गयी. उसका अंग हर पल सख्त होता जा रहा था. वह मेरे पास आकर लेट गया . शराब का दौर जोर पकड़ने लगा. जब चार पैग मेरे हलक में उअतर गए तो मैं भी नशे में टुल्ली हो गयी. मैंने उन दोनों
के खास अंगों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया. ब्रिज की उंगली मेरे यौवन द्वार पर दस्तक दे चुकी थी. अभी. मेरे सीने की गोलाइयों को चूम रहा था. शुरुआ़त में तो मुझे गुदगुदी सी महसूस हुई मगर फिर वासना की तेज आंधी ने मुझे
अपने आगोश में जकड लिया. मैंने महसूस किया कि उन दोनों मर्दों में से कोई एक मेरे होठों को चूस रहा था. मैं बेचैन होने लगी . मैंने कहा-
- बस भी करो, मुझे बेचैनी हो रही है. बड़ी प्यास नह्सूस हो रही है, इस प्यास को बुझादों.
ब्रिज- अभी क्या है मेरी जान अभी तो शुरुआत है. एक दिन ऐसा आएगा कि तुम हम दोनों के लिए तरसा करोगी, आहें भरा करोगी.
अभी- हाँ, यह ऐसा लड्डू है जिसे खाने पर भी पछतावा होता है और नहीं खाने पर भी.
ब्रिज- हाँ , पहले तो तुम मना कर रही थीं, अब खुद ही कह रही .
किरण- बहस मत करो. मेरी इस आग को शांत करदो प्लीज, मुझसे बड़ी भूल हुई जों पहले इनकार किया. अब दोनों आओ और आकर मेरे ऊपर छा जाओ.

No comments: