Sunday, January 30, 2011

बेवफा खँडहर - ३७
सूरज- ठीक है, सपेरा समझती हो ? जों बीन बजाकर साँपों को नचाते हैं ?
किरण- हाँ अच्छी तरह जानती हूँ, मैंने बहुत से साँपों का नृत्य देखा भी है. आगे बोलिए.
सूरज- एक सपेरे ने मेरे दादाजी से बहस करली थी की मन्त्र वगैरह की कोई शक्ति होती ही नहीं है. तब उन्होंने एक मन्त्र पढ़ा तो सपेरे का बीन उसके मुंह से ही अटककर रह गया. जानती हो तब उन्होंने
कौन से शब्दों का सहारा लिया था. सुनिए .अंजन बांधू , कंचन बांधू , बांधू सोरन काया, मैंने ज्ञान गुरु का पाया. मारू मन्त्र लगे ततैया , दुहाई हनुमन्त वीर की. शब्द साँचा, पिंड कांचा , फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा
किरण- ये क्या बड -बड कर रहे हो ? क्या मन्त्र ऐसे होते हैं. कुछ समझ में तो आने चाहिए .
सूरज- तुम्हारी समझ में में आये न आये मगर आत्मा तो सब समझ लेती है न, भूत -प्रेत की सब समझ में आ जाता है . आप क्या मानती हैं, इन मत्रों को हर कोई उच्च्चारण नहीं कर सकता .
किरण- क्यों ? इनमे ऐसी क्या खास बात होती है ?
सूरज- इनको सिद्ध करना पड़ता है. इन्हें पढ़ लेना या याद कर लेना तो बड़ा आसान है मगर सिद्ध करना बड़ा ही कठिन है. साथ में जों इन मत्रों का प्रयोग करता है उसकी नीयत भी साफ़ होनी चाहिए . उसमे
साफ़ लिखा है की जों बदनीयती से यानि की किसीका नुक्सान करने के उद्देश्य से मन्त्रों का सहारा लेगा तो मन्त्र उसका साथ नहीं देंगे , जबकि किसीके के सहायतार्थ यह यूज करोगे तो जरूर सफलता मिलेगी .
किरण- क्या तुमने कभी इन मन्त्रों का इस्तेमाल किया भी है या ऐसे ही धपंग मचा रहे हो ?
सूरज- जी नहीं, मैंने खुद आजमाया है , मै सुनी सुनाई बातें नहीं करता , भूत प्रेतों की बात तो नहीं मालूम मगर मैंने मन्त्रों की शक्ति से कई बच्चों की आँख से फूली जरूर खत्म करदी है. आप अगर आजमाना
चाहती हैं तो कोई ऐसा व्यक्ति बताएं जिसके आँख में फूली हो, मै एक मन्त्र पढूंगा सात बार , हफ्ते में सिर्फ दो बार पढूंगा और काम हो जाएगा
किरण- हा हा हा , अगर ऐसे मन्त्रों से आँख ठीक होने लगें तब तो सब लोग अस्पताल जाना बंद कर देंगे और तुम जैसे सयानों के पास लाइन लगाने लगेंगे .
सूरज- हंसिये मत मेमसाब. हहमारे यहाँ पर तो कम से कम ऐसा ही होता है. आसपास के गाँव में अगर किसीकी आँख में इस तारह की समस्या आई तो अस्पताल जाने की बजाय वे लोग मेरे पास आते हैं.
किरण- मुझे भी कोई मन्त्र सिखाओ न .
सूरज- सिकह तो दूंगा लेकिन उसे सिद्ध भी कर पाओगी क्या ? उसके लिए कलेजा मजबूत होना चाहिए . वैसे तो अलग -अलग मन्त्र को सिद्ध करने का अलग-अलग तरीका होता है मगर ज्यादातर मामलों
में रात के दरमियान शम्धान भूमि में मन्त्रों को सिद्ध करना होता है.
किरण- मुझे शमशान से डर नहीं लगता .
सूरज- क्या बात करती हैं , मेरा मतलब है की डर क्यों नहीं लगता ? कभी रात के दरमियान आप वहां गयी हैं?
किरण- हाँ , कई बार जाना हुआ है. मुझे भी शौक है कुछ शोध करने का , नया कुछ जानने का इसीलिए भटकती रहती हूँ. तुम चलोगे मेरे साथ ? यहीं पास में ही शमशान है. जब वहां पर कोई चिता जलती है
तब मैन जरूर जाने की सोचती हूँ, मेरी इच्छा होती है की उस चिता के पास बैठकर अलाप तापूँ .
सूरज- ये क्या कह रही हैं आप ? भला कोई आम आदमी ऐसी तमन्ना भी पालता है क्या ?
किरण- हाँ हाँ , क्यों नहीं ? तुम भी तो आम आदमी हो मगर मन्त्रों का पूरा ज्ञान रखते हो, उन्हें सिद्ध करने के लिए कभी न कभी शमशान भी जाते होंगे .
सूरज- मेरी बात अलग है. मैन तो मर्द हूँ .
किरण- अच्छा ठीक है, जब कभी इच्छा होगी तो तुम्हारे साथ ही जाउंगी, तब तो मुझे किसीकी दहशत नहीं होनी चाहिए , आखिर तुम जों मेरे साथ रहोगे .
सूरज का दिमाग भन्ना चुका था. उसकी कोई ज्ञान्द्रीय उसे फिर से यह आभास करा रही थी की उसके साथ या तो कुछ गलत होने वाला है या फिर हो चूका है. मगर उसने अपने सिर को एक तारफ झटक दिया
और प्यार के समुन्दर में गोते लगाना लगा, वे दोनों अब चरम अवस्था में पहुँचने वाले थे. सूरज पूरी ताकत का इस्तेमाल कर रहा था ताकि वह उसे सम्पूर्ण सुख
डे सके, उसने सुन रखा था की औरतें ऐसे समय जोर -जोर के प्रहार पसंद करती हैं इसलिए वह जोर -जोर से प्रहार करने लगा. किरण भी खामोश होकर रतिक्रिया का सुख ले रही थी, उसके मुख से अजीब तरह की
आवाजें निकल रही थी. उससे माहौल और भी ज्यादा उत्तेजक होने लगा .

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