बेवफा खंडहर वाली , भाग-10
किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होगी, डैडी से कहकर मैं तुम्हें वहाँ शिफ्ट करवा सकता हूँ, इसके लिए तुम्हें कुछ भी पे नहीं करना होगा. खाना भी बना बनाया मिलेगा . मैं भी तुमसे मिलने वहां
पर आ सकता हूँ. अगर तुम्हारी सहेली भी तुम्हारे साथ रहना चाहे तो हमें कोई ऐतराज नहीं होगा. वैसे ये सब आपकी इच्छा पर निर्भर है, मैं तो आपकी परेशानियों की वजह से ऐसा कह रहा हूँ. आने -जाने की तकलीफ बच जायेगी .
किरण- हाँ, आने -जाने की तकलीफ तो है मगर हमें आपके बंगले में रहने से आपको भी तो परेशानी होगी ,
अभिप्रिय-क्या बात करती हो ? हमें क्यों दिक्कत होंगी , यह सौभाग्य होगा हमारे लिए.
सूरज- यानि कि आपको लंबा चौड़ा लालच दे दिया गया ?
किरण- जी हाँ, और उसी लालच में हमारी इज्जत लुट गयी. उस दिन के बाद यह बात समझ में आई कि दुनिया में मेहरबानी करने वाले लोग तो बहुत हैं लेकिन , निस्वार्थ रूप से जरूरतमंद की सेवा करने वाले बड़े कम होते हैं.
सूरज- ठोकर खाने के बाद ही इंसान संभलना सीखता है. तुम भी अगर सबक सीख चुकी हो तो बेहतर . अब मैं आगे नहीं पिऊँगा , मुझे नशा जैसा हो रहा है.
किरण- फिर कुछ नहीं सुनाऊंगी, कहानी सुनाने का मतलब ही ये है कि हम आराम -आराम से पी सकें. तसल्ली से अगर पियेंगे तो कुछ नहीं होगा . एक साथ गटक जाओगे तो ज्यादा नशे के एहसास होगा ही न . बनाओ अपने हाथों से , अब तुम खुद
पैग तैयार करो , मगर बराबर -बराबर डालना . ऐसा न करना कि अपना गिलास खाली रखो और हमारा पूरा फुल करदो.
सूरज ने दो लार्ज पैग तैयार किये, दोनों ने सिप करना शुरू कर दिया. सूरज की आँखों में नशा उतरा आया था, काम वासना ने उन दोनों के जिस्मों में उबाल लाना शुरू कर दिया. सूरज ने पहली बार किरण के कामुक , नग्न बदन को देखा , उसकी
आँखों में चमक उभर आई, यह वासना की चमक थी, जिसे किरण अच्छी तरह से पहचानती थी. सूरज ने उसकी जवानी का रस चूसने की तैयारी शुरू करदी. वह उसके बदन को ऊपर से नीचे तक चूमने लगा था . किरण ने कुनमुनाते हुए कहा-
- यह क्या कर रहे हो सूरज, मैं पिघलने लगी हूँ. देखो, मुझे ये क्या हो रहा है. मेरा दिल अब मेरे वश में नहीं रहा. यह बेकाबू हो रहा है. जिस्म के अंदर ज्वाला सी भड़क रही है.
सूरज- मेरा हाल जानती हो ? ऐसा लगता है जैसे कि अगर मुझे तुरंत संतुष्टि नहीं मिली तो मेरे प्राण पखेरू उड़ जायेंगे . मुझे अपने अंदर समालो . इतना अंदर कि फिर कोई दूरी ही नहीं रहे.
किरण- तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली है. मैं खुद भी तो यही सब कहने जा रही थी, लेकिन कहते हैं कि दिल का हाल सुने दिलवाला. तुमने मेरा हाल सुन लिया है. मेरी भी जान पर बन आई है. मेरी जिंदगी बचालो .
सूरज- मैंने कभी ख्यालों में भी नहीं सोचा था कि जीवन में कभी ऐसा सुखद इत्तेफाक भी हो पायेगा. शारीरिक सम्बन्ध बनाने की बात तो छोडिये मैंने तो कभी आप जैसी हसीना के दर्शन करने की बात भी नहीं सोची थी . यूँ समझ
लीजिए कि सुंदरता का मतलब भी मुझे तुमसे मिल्कत पता चला है. इससे पहले तो मैं जानता ही नहीं था कि कोई लड़की तुम्हारे जितनी खूबसूरत भी हो सकती है.
किरण- तुम स्वयं भी कुछ कम नहीं हो .जबसे तुम्हें देखा है , दिल में घंटियाँ सी बजने लगी हैं. मन बावला और तन उतावला होने लगा है.
अब टीवी पर कुछ खास आइटम भी देखना चाहोगे या फिर ऐसे ही काम चल जाएगा ?
सूरज- जों जी में आये करो. मैं तो आज की रात कुछ बोलने वाला ही नहीं हूँ. मेहमान हूँ तुम्हारा. जैसे चाहो करो. टीवी चलाओ या फिर कुछ और करो.
किरण- आह, तुम्हारी जीभ का स्पर्श तन में आग लगा रहा है. देखो कैसी चिंगारियां उठ रही हैं.
सूरज- तुम्हारा प्रत्येक अंग कामुक है, खूबसूरत और मादक है. इसे हमेशा चूमते रहने और सहलाने को जी चाहता है.
किरण- और तुम बहुत मजबूत दिखाई देते हो. तुम्हारा यह खास अंग देखकर तो मुझे डर सा लग रहा है.
सूरज- क्यों ? क्या अभिप्रिय का विशेष अंग ऐसा नहीं है ? उसी डर नहीं लगा था क्या ?
किरण- नहीं, वो तो इसका आधा भी नहीं था. उसमे इतना मजा नहीं था यार . जबकि तुम्हारे इस खास नाग को देखकर तो मेरा दिल बैठा जा रहा है. एक तरफ तो थोड़ी सी दहशत है तो और दूसरी तरफ आकर्षण भी . कैसा
लगेगा इसके साथ खेलकर ? आनंद आएगा या फिर तकलीफ होगी ?
सूरज- मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जिससे आपको परेशानी हो. मैं तो आपको सुख देने के लिए यहाँ पधारा हूँ. अचानक ही सही मगर सही इरादे से आया हूँ.
किरण- अगर आज थोड़ी सी तकलीफ भी होती है तो गम नहीं. आज तो पूरा लेने का ईरादा है.
सूरज- अगर आपने ऐसा ईरादा कर ही लिया है तो मैं भी कुर्बानी देने के लिए बेताब हूँ, चाहे मजा आये या ना आये मगर यह सत्य है कि मैं साथ दूंगा .
किरण- आ जाओ , मेरे आगोश में सिमट जाओ . मुझे ऐसे करीब लों कि ज़रा भी दूरी न रहे.
Sunday, January 2, 2011
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