Sunday, November 8, 2009

मोहब्बत के मसीहा , भाग-11

असुरक्षित सेक्स के कारण कितने ही लोग असमय ही इस दुनिया से कूच कर गए , अखबार और टीवी में कितने समाचार रोजाना आते हैं, किसीको एड्स हो जाता है , किसीको कोई और बीमारी हो जाती है। इससे बचो बाबा , ऐसा ना हो की हमें फ़िर हमेशा के लिए सोचना पड़ जाए । सुना है की इन बीमारियों का कोई इलाज भी नही है।

राज - अरे हाँ यार , सच कहती हो । मैंने तो ये सब सोचा ही नहीं था । अचानक तुमने बताकर अच्छा कर दिया। मेरी आँखें खोलदी। इसलिए सच कहा है की सौ अनाडी दोस्तों से एक होशियार दोस्त ही काफी होता है। मुझे खुशी है है की मैंने तुमको अपना साथी चुना।

स्वीटी- हाँ राज, थोड़ी सी यह भूल हमारे जीवन को सबसे कठिन मोड़ पर लेकर जा सकती थी। यह भी कम नहीं की पहली बार में ही तुमने मेरी बात स्वीकार करली , वरना इस हद तक आकर किसी लड़के को समझाना बहुत मुश्किल होता है। तुम बहुत अच्छे हो ।

राज- हाँ , सच कहती हो । यह भी सच है की बीमारी किसीको नहीं पहचानती । जिसे लगनी हो लग ही जाती है। मैंने बहुत से बड़े लोगों को भी तिल -तिल करते मरते सुना है।

राज उसके करीब बैठकर उसके होठों को चूमने लगा, उसके गदराये बदन को चूमने लगा। उसके सीने को सहलाने लगा। स्वीटी इस वक्त भी गर्म आह भर रही थी, उसके दिल में जोरदार घंटियाँ बज रही थीं। वह ना चाहते हुए भी अपने दिल की बात मानने के लिए मजबूर थी, जी चाह रहा था की कहीं से कोई आ जाए तो उसे मन की इच्छा पूरी करने का अवसर मिल जाए। वे लोग जिस पार्क में मौज मस्ती कर रहे थे , वहां पर कुछ ऐसे हिजडे सक्रीय थे जो की यहाँ आने वाले प्रेमी जोडों से पैसे मांगते थे साथ ही दस गुनी कीमत लेकर वे निरोध भी उपलब्ध कराया करते थे, ठीक उसी समय एक हिजडा तालिया बाजाता हुआ उनके पास से गुजरा । राज को अपने एक दोस्त की बात याद आ गयी, उसीने हिजडे वाली बात बतायी थी। राज ने उसे आवाज देकर रोक लिया । उसकी खुशी का उस समय ठिकाना नहीं रहा , जब हिजडे ने सौ रुपये लेकर उनकी मांग पूरी करदी। खुश तो स्वीटी भी थी मगर अन्दर से दरी हुई भी थी, उसने कभी सोचा भी नहीं था की वह पहली बार जब प्रणय क्रीडा करेगी तो इस तरह पार्के के अन्दर झाडियों में करनी होगी। वह तो बस विचारों की स्वच्छंद थी। आजाद विचारों की मलिका स्वीटी चरित्रहीन बिल्कुल नहीं थी। किसी मर्द के साथ सम्बन्ध बनाने का उसका यह पहला अवसर था। वह इस अवसर को ठीक से सेलिब्रेट भी करना चाहती थी साथ ही चाहती थी की किसी तरह का कोई बवंडर न बने , अगर किसीको उसके करती का पता चल गया तो वह अपनी सोसायटी में किसीको मुह नहीं दिखा पाएगी। उसके परिवार वाले उसको कभी नहीं रोकते -टोकते थे, लेकिन जब किसीको उसकी इस हरकत के बारे में पता चल गया तो क्या बीतेगी घरवालों पर ? कोई भी जी नहीं पायेगा। तो फ़िर क्या करे ? उसने राज से एक बार फ़िर पुछा -

- राज, हम लोग कुछ ग़लत तो नहीं कर रहे न ? बड़ा डर सा लग रहा है ।

स्वीटी- तुम बहुत भोली हो, ये सब हम दोनों की मर्जी से हो रहा है , हम लोगों ने शराब पी है क्या ? कोई और नशा किया है क्या ? नहीं । फ़िर ? इसका मतलब ये हुआ की हम लोग जो कुछ भी करने जा रहे हैं, वो पूरे होशो हवाश में कर रहे हैं, अपनी इच्छा से कर रहे हैं, हम पर किसी तरह का कोई दवाब नहीं है।

स्वीटी- हाँ, वो तो है मगर फ़िर दिल और दिमाग पर उलझन कैसी है ? यह कैसा प्रेशर है ?

राज- क्योंकि हम दोनों ही पहली बार इस सुख को भोगने जा रहे हैं , अब तक मेरी जगह पर कोई चालू लड़का होता तो कबका खेल खेलकर निकल भी गया होता। और तुम्हारे स्थान पर अगर क्पोई चालू लड़की होती तो मौज मस्ती करके घर भी पहुच गयी होती। हमारा -तुम्हारा मामला अलग है। हम लोग तो एक दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं, एक से प्यार करते हैं।

स्वीटी- हाँ, तभी तो ऊपर वाले ने हम लोगों को ही मिलवाया है।

स्वीटी और राज इस समय जो भी बातें कर रहे थे , उनमे भावुकता थी, बदन काम वासना की आग में झुलस रहा था, मन में जबरदस्त उथल-पुथल मची हुई थी, आस- पास भी कई जोड़े मन और तन की प्यास शांत कर रहे थे।

No comments: