Thursday, November 26, 2009

भाग-२९ पार्ट 2

वे लोग खूब इंजॉयकरते हैं , मगर मजाल है जो कदम भी डगमगा जाएँ। सवाल ही नहीं उठता ।
राज- आज तुम्हारा और हमारा यह पहला अवसर है , जब हम बार-बार इसे दोहराएंगे तो हम लोग भी उन की तरह ही पक्के हो जायेंगे।
स्वीटी ने बात करते -करते ही ब्लू फ़िल्म की सीडी चालू करदी। शुरुआत में तो सब कुछ सामान्य था मगर फ़िर अगले ही पल धमाका हो गया , यह बहुत भयानक द्रश्य थे। एक हलकी कद काठी का व्यक्ति खूबसूरत लड़की के ऊपर हावी हो रहा था, उस फ़िल्म के नायक का संवेदनशील अंग बेहद खतरनाक था। इतना डरावना अंग तो स्वीटी ने कभी फ़िल्म में बात ही नहीं देखा था, उसकी नायिका जख्मी शेर की तरह दहाड़ रही थी मगर नायक की पकड़ मजबूत थी , इस कारण वह हिल दुल भी नहीं पा रही थी। नायक ने उसे मज्बूतो से भींच रक्खा था और उस पर सवारी करने में भिदा था, नायिका के दर्द का उस पर ज़रा भी असर नहीं हो रहा था, बीच- बीच में वह अपने उस अंग को बाहर निकालकर उस पर किसी तरह की कोई मालिश भी किया करता था। इस बीच वह खूब कोशिश करती की उसकी पकड़ से बाहर हो जाए लेकिन हर बार उसकी पकड़ पहले से बेहतर हो जाया करती थी। स्वीटी का शरीर उसे देखकर झनझनाने लगा।उसने ठंडी आह भरते हुए कहा-
- आह... ऐसा डेंजर सीन तो ना कभी देखा है, न कभी देखा जाएगा।
राज- ये असली नहीं हो सकता, जरूर कोई गड़बड़ घोटाला है, वरना इतना बड़ा अंग तो मैंने कभी सुना भी नहीं ।
स्वीटी- इससे जल रहे हो क्या ? मुझे नहीं चाहिए ऐसा । मैं तो तुम्हें ही ठीक से बर्दाश्त नहीं पाती फ़िर इसकी बात ही अलग है। मुझे तुम ही अच्छे लगते हो। तुम्हारे सिवाय और कोई पसंद नहीं है।
राज- मुझे मत चाधाना , मैं अगर चाहूँ तो अपना आकर भी बढ़ा सकता हूँ। बाजार में दवाओं की कमी है क्या ?
स्वीटी- रहने भी दो, जाने भी दो। इन chakkron में नहीं aanaa। वे davaayen नहीं jahar की तरह होती हैं।न जाने क्या -क्या डालकर बनाई जाती हैं। उनका मकसद सिर्फ़ पैसा कामना होता है। लोग झिझक के मारे ऐसी दवाओं की शिकायत भी नहीं कर पाते।
राज- ओहो। तुम भी ना । ऐसे बात करती हो जैसे मैं अभी खरीदने जा रहा हूँ। अरे बाबा, मैं कह रहा था की अगर तुम चाहोगी तो। तो मैं ऐसा करूँगा समझीं।
स्वीटी- हाँ समझ गयी , मगर मैं ये बताना चाहती हूँ की यदि मैं चाहती हूँ तो भी तुम कभी ऐसा काम मत करना , आकार बढ़ाने के लिए फालतू दवाओं का इस्तेमाल कभी मत करना।

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