हम सच कहते हैं। हमने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे मोहब्बत पर आंच आए।
राज- हाँ महाराज , हम लोग अच्छे संस्कारित घरों से हैं। वैसे भी आप हमसे कोई ग़लत बात की उम्मीद नहीं कर सकते। सच कहता हूँ। मैं तो जीवन में कभी झूठ भी नहीं बोलता। आज तक नहीं बोला ।
पीर- ठीक है। मैं तुम लोगों की सीधी सच्ची बात से खुश हुआ। मैं मदद करूँगा तुम लोगों की।बोलो न क्या चाहते हो तुम ? तुमको किस चीज में सबसे ज्यादा खुशी मिलती है ?
राज - सबसे पहला हमको इस अंधेरे से निकाल दीजिये , हम सुरक्षित मुख्य सड़क तक पहुचना चाहते हैं। हमारी मदद कर दीजिये ,हमें घर पर ठीक से पहुच्वा दीजिये ।
पीर- कोई बात नहीं । यह काम हो जाएगा। इसके अलावा और कुछ हो तो बताइये। यह तो चुटकी बजाते ही हो जाएगा। मैं चाहता हूँ की तुम जब मिल ही गए हो और तुमने मेरा दिल जीत ही लिया है तो मैं तुम्हें कुछ तौहफा दे दूँ। इसलिए सोच समझकर मांगो , क्या माँन्गते हो ?
राज- हम दोनों अलग- अलग मांगना चाहेंगे । अगर मंजूर हो तो बोलो। वरना जैसे आदेश होगा , निभाएंगे ।
स्वीटी=- हाँ महाराज, मैं अलग मांगूंगी और राज अलग मांगेंगे। वो भी चुपचाप कहेंगे धीरे से।
राज- मगर मैं स्वीटी के सामने ही माँगता हूँ। महाराज मुझे स्वीटी का साथ दे दीजिये हमेशा -हमेशा के लिए । मैं स्वीटी के बिना अब एक पल भी नहीं रह सकता। मेरे तन और मन पर सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वीटी का ही नाम लिख चुका है, मैं इसके बिना जिदगी जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। स्वीटी मेरे जीना का मकसद है, इस जन्म में ही नहीं हर जन्म में मैं इसको चाहूँगा , इसीको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकारुन्गा।
पीर - तुम्हारा प्रेम देखकर मैं बहुत खुश हुआ । काश, सब लोग अपने चाहने वालों को इतना ही चाहें तो लड़ाई -झगडे की कोई गुंजाइश ही नहीं बचे। तब कोई परेशानी ही नहीं बचे।
राज- महाराज, मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ की पहले इसकी तरफ़ मेरा ज्यादा ध्यान नहीं था, मुझे प्यार मोहब्बत से कोई वास्ता ही नहीं था, मैं तो प्रकृति प्रेमी हूँ। मैं चाहता हूँ की सब लोग खुश रहें। हम उन मूक प्राणियों की भी सेवा करें जो बोल और सुन नहीं सकते। मैं ऐसे ही पशु पक्षियों के लिए राष्ट्रीय स्टार पर काम करना चाहता था तभी तो मेरा ध्यान कहीं और जगह पर नहीं था , मगर फ़िर अचानक स्वीटी आज मुझे यहाँ पर मिल गयी। यह अपनी किसी सहेली से मिलने आयी थी, इनकी सहेली पार्क के अन्दर थोडी देर के लिए अपने दोस्त से मिलने चली गयी और वह लेट हो गयी। ख़ुद मैं भी तो अपने एक दोस्त के साथ आया था , लेकिन वह भी लेट हो गया। अचानक हमारी मुलाक़ात हो गयी । मैंने स्वीटी से मिलकर यह महसूस किया की इनके बिना मेरा जीना निरर्थक है, मैं स्वीटी के प्यार में मतवाला हो गया हूँ। मुझे और कुछ अच्छा नहीं लगता , कुछ भी चीज इससे प्यारी नहीं लगती, मुझे स्वीएती दिलवा दीजिये , एक वर्ष तक तो क्या , जब तक जिऊँगा तब तक तुम्हारी मजार पर दीपक जल्वाऊंगा , रोजाना ख़ुद यहाँ पर आकर झाडू लगाया करूँगा, यह मेरा वादा है।
पीर- तुम्हारी प्रेम कथा सुनकर मैं भी भाव विभोर हो गया। मेरे मन में तुम्हारे लिए और भी स्नेह हो गया है। लेकिन मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर सकता, क्योंकि यह सिर्फ़ तुम्हारे अकेले के जीवन से जुडी बात नहीं है बल्कि इससे स्वीटी भी जुडी हुयी है, इस बारे में मुझे स्वीटी की राय भी जनानानेई होगी वह भी अकेले में,
राज- मुझे कोई एतराज नहीं है महाराज, आप जैसा उचित समझें वैसा करें।
यह सब सुनकर स्वीटी की उलझनें बढ़ गयी थीं, वह जानती थी की पीर बाबा ने उसके मन की बात समझ ली हैं तभी उसने राज से वादा नहीं किया। स्वीटी उसके साथ मौज मस्ती करने के मूड में तो थी लेकिन शादी करने के मूड में नहीं। उसने मन में सोच लिया था की वह राज से हर सुख तो वसूलेगी मगर जिन्दगी भर के लिए उसे गले से नहीं लात्कायेगी।
Friday, November 13, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment