राज- सिर्फ़ आज की ही क्यों, मैं तो तुम्हारी जीवन भर की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हूँ।
स्वीटी- खातिर जमा रखो, यह भारी भरकम जिम्मेदारी तुम्हिको मिलने वाली है , किसी और को नहीं मिलेगी।
राज ने स्वीटी को अपनी बांहों में कसकर भींच लिया और उसके अंग प्रत्यंग को चूमने लगा। स्वीटी गर्म हो चुकी थी, वह भी अपने आपको राज के रंग में ढालने लगी। उन दोनों में थोड़ी देर तक ऐसे ही नूर कुश्ती चलती रही और फ़िर जल्द ही दोनों एक दूओसरे में समा गए, उन दोनों के मुख से आहें निकल रही थीं, जब राज ने उस पर हावी होना शुरू किया तो स्वीटी को लगा जैसे किसी ने उसको आसमान में उड़ा दिया है, दर्द की लकीर खीचने लगी थी। स्वीटी को राज ने अपनी मजबूत बांहों में जकड लिया था, इतना की वह तस से मास भी नहीं हो पा रही थी, वह कसमसा रही थी मगर राज तो उस समय बेदर्दी की भूमिका में था, वह उसकी तरफ़ देख भी नहीं रहा था , बस अपने काम को अंजाम देने में लगा था। उसको लगता था जैसे की इस बार भी अगर वह चूक गया तो फ़िर कभी भी अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पायेगा, स्वीटी को इस समय राज से सहानुभूति की उम्मीद थी लेकिन इसके बजाय वह तो कुछ अलग ही कर रहा था, वह कुछ बोलने की कोशिश करती तो राज उसके होठों को अपने होठों से ढँक लिय़ा करता था, यही कारण था की वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी, यह स्वीटी का पहला अनुभव था.उसको तकलीफ हो रही थी। यह तकलीफ इतनी ज्यादा थी की स्वीटी का रोने का दिल कर रहा था। लेकिन चाहकर भी रो नहीं पा रहा था, इसी कारण वह अन्दर ही अन्दर घुट रही थी। राज उस पर वार पर वार कर रहा था , उसके प्रहार से स्वीटी तड़प कर रह जाती थी।राज ने जब स्वीटी के होठों से अपने होठ हटाये तो स्वीटी ने कहना शुरू किया-
-आह,, यह कर रहे हो । क्यों मगर ? मेरा दम घुट रहा है। मेरी जान निकली जा रही है। मुझे लगता है की मैंने यहाँ पर आकर कोई भूल की है। शायद मेरा दम निकल जाएगा।
राज- नहीं यार। ऐसी कोई बात नहीं है। जिसे तुम दर्द समझ रही हो यह प्यार का संगीत है। यहाँ से आनंद की शुरुआत होती है। यह सुख हमको एक नई दुनिया में ले जाएगा। यह मोहब्बत की दुनिया है। यहाँ से जो रास्ता निकलता है , वह भले ही पहले तकलीफ देता है मगर बाद में सुख ही सुख हैं। मौज मस्ती हैं ।
स्वीट- तुमने मुझे लूट लिया राज, मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। तुमने तो कहा था की तुम मोहब्बत कर रहे हो , लेकिन इस छलावे में रखकर तुमने मेरी इज्जत ही लूट ली।
राज- और मेरे साथ क्या हुआ , ये क्यों नहीं कहतीं की तुमने भी मेरी इज्जत लूट ली है।
स्वीटी- ऐसा कभी किसी ने बोला है क्या ? हमेशा लड़की की ही इज्जत लुटाती आयी है।
राज- तो क्या हुआ , परम्परा को बदलना चाहिए। ग़लत परम्परा जो है। जो तुमने पाया, वह मैंने भी पाया है और जो मैंने खोया तुमने भी तो वही खोया है, इससे कम ज्यादा किसीको कुछ हासिल नहीं हुआ।
स्वीटी- तुम बहुत बातूनी हो , ऐसे ऐसे तर्क देते हो की कुतर्क भी अच्छा लगने लगता है।
राज- अच्छा ये बताओ की तुमने सुहागरात की बात नहीं कही थी, कंडोम तुम्हारी स्वीकृति से नहीं खरीदा गया था, अगर ये सब था तो फ़िर अब इज्जत लुटने की बात कहाँ से आ गयी ?
स्वीट-मैं अब तुमसे कभ्जी बात नहीं करुँगी। मुझे डर लगने लगा है तुमसे ।
राज- मेरा दावा है की अब तुम मेरे बिना एक पल भी नहीं रह पाओगी। हर पल तुम्हें मेरी याद सताएगी, तुम्हारा यह पहला अवसर है इसलिए इतनी तकलीफ हो रही है, आगे -आगे देखो क्या होता है ?
स्वीटी- ठीक है । अब मैं चलती हूँ। तुम्हारा यह चैलेन्ज भी देखती हूँ ।
राज - मेरी चुनौती कम और प्यार ज्यादा देखो, मेरी भावनाओं को ज्यादा समझो।
Friday, November 20, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment