Thursday, November 5, 2009

मोहब्बत के मसीहा , भाग- 8

अब मेरी एक यही जिद है किसी भी तरह से राज को अपनी अदाओं में उलझाना है और फ़िर उसको अपना दीवाना बनाकर दूध में पडी हुई मक्खी की तरह निकालकर फेंक देना है। यही सजा देनी है उसको ।
रचना -बुरा नहीं मानो तो एक बात पूछू क्या ? दिल में बार -बार एक सवाल उठ रहा है ।
स्वीटी- बोलो , जानती हूँ क्या बीत रही है तुम्हारे दिल पर । तुम इस समय और बीयर पीना चाहती हो ।
रचना- नहीं यार । मैं ये जानना चाहती हूँ की राज से तुम्हारी क्या व्यक्तिगत दुश्मनी है ? क्योंकि छोटी-मोटी बात पर तो कोई भी इतना पंगा नहीं ले सकता। जरूर उसने तुम्हें कोई ख़ास चोट दी होगी।
स्वीटी- मेरे लिए यहेई बात बहुत मायने रखती है की कोई मुझे नजरअंदाज करदे।
उसने कई अवसरों पर मुझे इग्नोर किया, इससे मैंने मन ही मन अपने आपको अपमानित महसूस किया । मैंने कई बार उसको हैलो -हाय किया मगर पत्थर की तरह व्यवहार करता है। मेरी खूबसूरती और मेरी अदाओं के जलवों को चेलेंज करना चाहता है। मगर मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।मैं उसे मुँहतोड़ जवाब दूंगी, उसकी किसी भी बदतमीजी को मैं ऐसे ही नहीं छोड़ सकती।
रचना- बदतमीजी ? तो क्या कभी वह इस हद तक भी गिर गया था ?
स्वीटी=- हिम्मत है क्या उसकी ? उसने मेरे सवाल का मेरे मन के अनुसार जवाब नहीं दिया , यह भी तो एक किस्म की बदतमीजी ही हुई न ? तुम क्या कहती हो ?
रचना- बराबर है। बिल्कुल सही बात है । बड़ी बदतमीजी तो यही है।उसको जवाब दिया जाएगा।
स्वीटी- हाँ , मेरी जान। अब ठीक है। अब हम लडेंगे जरूर। उससे बदला लेंगे जरूर।
रचना- अच्छा ठीक है। अब चलना होगा मुझे। लगता है बीयर चढ़ने लगी है। सुरूर सा होने लगा है।
स्वीटी- अरे कुछ नहीं यार। एक बार पेशाब करने जायेगी , बीयर का सारा मसला फिनिश हो जाएगा, कुछ नहीं बचेगा। सच मानो। किसीको शक भी नहीं हो सकता।
उन दोनों की वार्ता वहीं पर ख़त्म हो गयी, लडखडाते हुए क़दमों से रचना अपने घर चली गयी। स्वीटी ने बीयर की बोतलें भी उसकी सुपुर्द करदी थीं ताकि वह रास्ते में उनको फेंकती चली जाए, और फ़िर खाना खाकर वह ख़ुद भी सो गयी। वह सोने से पहले राज के बारे में ही सोच रही थी। सोने के बाद उसे सपने में भी राज ही दिखाई देने लगा। उसे वह सपने में एक गार्डन में मिला। गार्डन में सैकडों युवा जोड़े थे, कोई अपनी महबूबा के बालों में कंघी कर रहा था तो कोई अपनी प्रेमिका को चूम रहा है। उन्हीं में से एक है राज । वह अकेला घूम रहा है। कुछ परेशान सा है। उसकी उलझन इसीसे समझी जा सकती है की वह बार-बार किसी को देख रहा है , किसीको ताक रहा है। तभी कहीं से स्वीटी आ जाती है। राज के पास पहुचकर पूछती है-
- अरे राज , तुम यहाँ ? किसका इन्तजार कर रहे हो ? कुछ ख़ास बात है क्या ?
राज- नहीं यार। कुछ ख़ास नहीं। दरअसल मेरा एक दोस्त आने वाला है । टाइम तो हो गया , उसका मोबाइल भी स्विच ऑफ़ है । समझ में नहीं आ रहा क्या करुँ ?
स्वीटी - कोई दोस्त है या किसी प्रेमिका का इंतजार कर रहे हैं ?
राज - नहीं, नहीं दोस्त हैं। प्रेमिका तो अभी तक कोई है ही नहीं। हाँ मेरा दोस्त जरूर अपनी प्रेमिका के साथ आया था। मगर उसे अब तक तो आ जाना चाहिए था। आया क्यों नहीं। आप यहाँ कैसे ? किसी बॉय फ्रैंड के साथ आई हो क्या ? लग तो कुछ ऐसा ही रहा है ।
स्वीटी- नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं नहीं है। मैं भी यहाँ पर एक सहेली से मिलने ही आयी थी ।
राज- वाह । क्या इत्तेफाक है, तुम्हें यहाँ पर सहेली नहीं मिली और हमको यहाँ दोस्त नहीं मिला। अब जब ऐसा ही है तो चलो फ़िर कहीं चलकर बैठते हैं।
और फ़िर सकुचाती हुई स्वीटी भी उसके साथ -साथ चलदी। राज एक सुनसान जगह पर जाकर रुक गया। उससे थोड़ी दूरी पर ही एक प्रेमी जोड़ा प्यार के रन में रंगकर मगन हो रहा था।
जब वहाँ पर स्वीटी और राज बैठे तो राज ने स्वीटी के गोरे गाल पर एक चुम्बन अंकित कर दिया, यह तो शुरुँआत मात्र थी, आगे -आगे तो राज और भी आक्रामक होता गया। वह स्वीटी के उभरे हुए वक्ष को सहला रहा था , उसके बदन को दबा रहा था , स्वीटी कसमसा रही थी, उसका दिल खूब जोर -जोर से धड़क रहा था। वह कुछ कहना चाहती थी लेकिन राज ने उसके होठों पर अपने होठ रख दिए । काम्ज्वाला भड़क उठी।












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